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________________ न्यायपूर्वक राज्य किया। अपने पूर्वजों के धर्म में विक्रमादित्य की विशेष आस्था रही । एक सौ वर्ष पर्यन्त उज्जैनी पर गर्छमिल्ल वंश का राज्य रहा। डा. कृष्णस्वामी आयंगर ने दो तमिल ग्रन्थों 'शिलपथीकारम्' एवं 'मणिमेखलायो' में वर्णित कई विवरणों से तत्कालीन कलिंग का परिचय कराया है। उन दोनों ग्रन्थों में कलिंग राजवंश के दो भाइयों के विवाद का वर्णन दिया गया इससे मालूम होता है कि कलिंग राज्य उस समय दो खण्डों में विभक्त हुआ था। एक की राजधानी कपिलपुर और दूसरे की सिंहपुर । इन दोनों राज्यों में जो दो भाई राज करते थे। वे खारवेल के वंशधर थे। संभवतया इसी फूट का लाभ उठाकर दक्षिण का सातवाहन नरेश गौतमी पुत्र शातकर्णी कलिंग विजय करने में सफल रहा। दूसरी शती ई. के अन्त में आन्ध्र सातवाहनों का पतन होने पर अयोध्या निवासी तथा इक्ष्वाकुवंशी श्री वीरपुरुषदत्त नामक व्यक्ति ने कलिंग को हस्तगत किया। जैन धर्म तो कलिंग में पहले से प्रचलित था, दूसरी तीसरी शती ई. में बौद्धाचार्य नागार्जुन द्वारा बौद्धमत का भी इस प्रदेश में प्रसार हुआ। ब्राह्मण धर्म भी धीरे-धीरे प्रविष्ट हो गया। अतः गुप्त काल से ही इस देश में उक्त तीनों धर्मों की प्रवृत्ति साथ-साथ पायी जाती है। समुद्रगुप्त के आक्रमण के फलस्वरूप कुछ काल के लिये कलिंग के कुछ भाग पर वाराणसी से भागे हुए शक क्षत्रपों का भी राज्य रहा प्रतीत होता है। उसी काल में प्राचीन राज्यवंश के कुछ लोग सिंहल ( लंका) में भी जा बसे । पांचवीं छठी ई. में कलिंग देश में चार राजवंशों का उदय होना प्रतीत होता है पहली पूर्वी गंगों का था । कर्णाटक के गंगवंश की एक शाखा ने कलिंग देश में दन्तपुर या श्वेतक को अपनी राजधानी बनाकर पूर्वी गंगवंश की स्थापना की थी। अपना गंगा संवत् (प्रारंभ 497 ई.) भी प्रचलित किया था। इस वंश के राजाओं के अभिलेख गंग संवत् 28 से 114 पर्यन्त तक मिलते हैं। इस वंश के नरेशों के मूल कर्णाटक वंश का कुल धर्म जैन धर्म था । अतः ये भी उसके अनुयायी होना स्वाभाविक है। इस वंश के अंतिम राजा की पुत्री का विवाह एक नागवंशी सरदार के साथ होने से यह राज्य नागवंश के अधिकार में चला गया, जो मुसलमानों और फिर मराठों की अधीनता में रहता हुआ 18 वीं शती तक चलता रहा। - - दूसरा वंश तोशलि के मौमकरों का था । इस वंश के संस्थापक खारवेल के किसी सामन्त का वंशज रहा प्रतीत होता है। मौर्यकालीन प्राचीन महानगरी तोशलि को ही इस वंश ने अपना केन्द्र बनाया था। कियोंझर राज्य प्राय: इसी प्रदेश में रहा है। इसका शासक मंजीवंशी उड़ीसा के सर्व प्राचीन वंशों में समझा जाता है। संभव है वर्तमान मंजी राजा प्राचीन मौमकरों के वंशज हों। इस राज्य के आनन्दपुर तालुके में उससे 10 मील दूर वन में प्राचीन बस्तियाँ हैं। इनके आस- पास वनों और पहाड़ों में जैन तीर्थंकरों एवं देवी- देवताओं अनगिनत - प्राचीन खण्डित - अखण्डित मूर्तियाँ, विशाल मंदिर देवायतन, स्मारकों आदि के खण्हर मिले हैं। कुछ मूर्तियों पर ब्राह्मीलिपि में लेख भी उत्कीर्ण हैं। इससे विदित होता है कि खारवेल के उपरान्त भी मौमकरों के राज्यकाल में गुप्त काल के अन्त तक इस प्रदेश में जैन धर्म फलता फूलता रहा। ऐसा प्रतीत होता है कि आठवीं शताब्दी से वाममार्ग, शैव और वैष्णवों के बढ़ते प्रभाव ने इस केन्द्र को धीरे धीरे उजाड़ दिया। तीसरा वंश कोंगद का शैलोद्रव वंश था। अनुमानतः यह कोई पर्वतीय वंश था । इस वंश का संस्थापक पुलिन्द सेन का पुत्र शैलोद्रव था। इसके वंशजों ने 5 वीं शती अर्हत् वचन, जनवरी 99 26
SR No.526541
Book TitleArhat Vachan 1999 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnupam Jain
PublisherKundkund Gyanpith Indore
Publication Year1999
Total Pages112
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Arhat Vachan, & India
File Size8 MB
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