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________________ ने जैन धर्म के नमस्कार मूलमंत्र को लक्ष्य करके अपनी भक्ति प्रदर्शित की है। शिलालेख की प्रथम पंक्ति में लिखा है - 'नमो अरहंताणं, नमो सवसिधानं'। अरहंतों एवं सर्वसिद्धों को नमस्कार करके चैत्र - (चेति) राज्यवंश की प्रतिष्ठा के प्रसारक, प्रशस्त एवं शुभ लक्षणों से युक्त, चारों दिशाओं विश्व के आधार स्तंभ, अनेक गुणों से विभूषित कलिंग देश के अधिपति एलवंशी (मा आर्य) महाराज महामेघवाहन श्री खारवेल द्वारा यह लेख उत्कीर्ण कराया गया। __ हाथी गुफा शिलालेख की पन्द्रहवीं पंक्ति पढ़ने से मालूम होता है कि 'अपने राज्य काल के तेरहवें वर्ष में खारवेल ने जैन सन्यासियों के लिये कुमारी गिरि पर 117 गुफायें निर्मित कराईं थीं, और साथ - साथ दूसरे धर्म के साधु और सन्यासियों के लिये भी (सकल समग - सुविहिता) एक दूसरी गुफा का निर्माण किया था। । तपस्वी मुनियों के निवास के लिये गुफायें बनवायी, स्वयं उपासक (श्रावक) के व्रत ग्रहण - किये और अर्हत्मंदिर के निकट उसने एक सुन्दर विशाल सभामण्डप (अर्कासन गुफा) बनवाया जिसके मध्य में एक बहुमूल्य रत्नजटित मानस्तंभ स्थापित किया गया। उक्त सभामण्डप में उसने उन समस्त सुकृत, सुविहित, ज्ञानी, तपस्वी श्रमणों (जैन मुनियों) का सम्मेलन किया जो चारों दिशाओं से दूर - दूर से उसमें सम्मिलित होने के लिए आए थे। इस मुनि सम्मेलन में राजा ने भगवान की दिव्य ध्वनि में उच्चारित उस शान्तिदायी द्वादशांग श्रुत का पाठ कराया, जो कि महावीर संवत् 165 से निरंतर हास को प्राप्त होती (तथा उसके उद्धार का प्रयत्न किया) और इस प्रकार क्षेमराज, वृद्धिराज, भिक्षुराज (राजर्षि) धर्मराज नरेश ने भगवान की उक्त कल्याणकारी वाणी के सम्बंध में प्रश्न करते हुए श्रवण और चितवन करते हुए समय बिताया। विशिष्ट गुणों के कारण दक्ष, समस्त धर्मों का आदर करने वाला, धर्म संस्थाओं का उद्धार, सुधार एवं संस्कार करने वाला, अप्रतिहत-चक्रवाहन (जिसके रथ, ध्वजा, सेना की गति को कोई नहीं रोक सका), साम्राज्यों का सतत् विजयी एवं साम्राज्य संचालक और संरक्षक, राजर्षियों के वंश में उत्पन्न महाविजयी राजचक्री ऐसा राजा खारवेल था। . जैन धर्म को सुप्रतिष्ठित करने के उद्देश्य में तत्पर उनकी कर्मतत्परता, प्रयत्न और दान इतिहास में सदैव स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगा। उनके शासन में जैन धर्म कलिंग में उन्नति के शिखर पर पहुंचा था। मगध से 'कलिंग जिन' का उद्धार करके उन्होंने जातीय धर्म देवता की पुन: संस्थापना की थी। - इसके बाद ही खारवेल के जीवन में परिवर्तन का अध्याय आरंभ हुआ। धीरे - धीरे धर्म का आदर्श उनमें अभिभूत हुआ था। राजत्व के चौदहवें साल में महामेघवाहन सम्राट खारवेल को हमेशा के लिए कलिंग इतिहास से बिदा लेकर अनन्त विस्मृति के गर्भ में लीन होना पड़ा। इसके बाद उनके विषय में जानने के लिये कोई साधन नहीं है। प्रथम शताब्दी ई. पू. के पूर्वार्द्ध में खारवेल के एक वंशज, वक्रदेव के पुत्र महेन्द्रादिव्य गन्धर्व सेना गईमिल्ल (या खरमिल्ल) ने मालवे के नवस्थापित गणराज्य का नायकत्व प्राप्त करके उज्जैनी में गईमिल्ल वंश की स्थापना की। गर्दमिल्ल के अत्याचारों ने उसे कालकाचार्य के प्रयत्न से शकों द्वारा ई.पू. 61 में च्युत एवं देश से निर्वासित कराया। किन्तु ई.पू. 57 में उसके पराक्रमी पुत्र और विक्रमादित्य ने शकों को मार भगाया और दीर्घकाल तक अर्हत् वचन, जनवरी 99 25
SR No.526541
Book TitleArhat Vachan 1999 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnupam Jain
PublisherKundkund Gyanpith Indore
Publication Year1999
Total Pages112
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Arhat Vachan, & India
File Size8 MB
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