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की वाणी कलिंग के कोने-कोने में प्रचारित हुई थी। यह एक तथ्य है कि अशोक के समय में और उसके बाद में भी कलिंग जैन धर्म का प्रमुख केन्द्रस्थल था। 'चेति' राजवंश के साहचर्य और संरक्षण से इस धर्म के प्रसारण में विशेष सहायता मिली। जब उत्कल के इतिहास में खारवेल का आविर्भाव हुआ तब जैन धर्म की प्रगति में कोई अवरोध नहीं रहा । खारवेल स्वयं जैन धर्म के उपासक और प्रधान पृष्ठपोषक थे। हाथी गुफा शिलालेख लिपि से प्रमाणित होता है कि नंदराज कलिंग विजय के बाद कलिंग जिन को यहाँ से ले गये थे, खारवेल उसी मूर्ति को अपने राजत्व काल के द्वादशवें वर्ष में अंग और मगध पर अधिकार करके कलिंग लौटाकर लाये थे। इस सुअवसर पर शोभायात्रा निकालने की तैयारी की थी। खारवेल की विराट सैन्यवाहिनी और कलिंग के असंख्य नागरिकों ने उस महोत्सव में योगदान दिया था और कलिंग साम्राज्य के सम्राट ही स्वयं उसके समर्थक एवं उत्सव को सुन्दर रूप से सम्पन्न करने के लिये प्रयत्नशील हुये थे। संगीत और वादियों की ध्वनि समारोह में 'कलिंग जिन' को पुनः कलिंग में स्थापित किया गया। हाथी गुफा के शिलालेख लिपि से यह स्पष्ट मालूम होता है कि खारवेल और उसके परिवार के सभी लोग जैन धर्मावलम्बी थे। उनकी भक्ति और स्नेह 'कलिंग जिन' के साथ ओत-प्रोत थी ।
खारवेल के समय में खंडगिरि और उदयगिरि में जैन साधुओं के लिये सैकड़ों गुफायें निर्मित हुई थी। खारवेल स्वयं जैन थे इस कारण जैन साधुओं के प्रति उनकी व्यक्तिगत अनुरक्ति थी । सम्राट खारवेल का इतिहास प्रसिद्ध शिलालेख (नीचे देखें) उड़ीसा प्रदेश के पुरी जिले में स्थित भुवनेश्वर से तीन मील की दूरी पर विद्यमान खण्डगिरि पर्वत के उत्तरी भाग पर, जो कि उदयगिरि कहलाता है, पर बने हुए हाथी गुफा नाम के एक विशाल एवं प्राचीन कृत्रिम गुफा मंदिर के मुख एवं छत पर उत्कीर्ण है। 17 पंक्तियों का महत्वपूर्ण
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यहाँ मुद्रित शिलालेख विश्व के अत्यन्त महत्वपूर्ण शिलालेखों में से एक है। इसे कलिंग के चेदिवंशीय दिग्विजयी जैन सम्राट खारबेल ने ईसापूर्व द्वितीय शताब्दी में भुवनेश्वर के पास कुमारी पर्वत पर खुदवाया था, जो हाथीगुम्फा या खारवेल शिलालेख के नाम से भी प्रसिद्ध है। यह 'ओड्मागधी प्राकृत भाषा में निबद्ध है तथा इसकी लिपि 'ब्राह्मी लिपि' है। यह इतिहास, भाषा शास्त्र एवं पुरातत्व की दृष्टि से राष्ट्र की अद्वितीय, अमूल्य निधि है। विशेषत: यह जैन समाज के लिये तो सर्वाधिक गौरवप्रद एवं महत्वपूर्ण ऐतिहासिक विरासत है, जो बाईस शताब्दियों के बाद भी आज हमें उपलब्ध है।
लेख 84 वर्गफीट क्षेत्र में लिखा हुआ है। लेख की भाषा प्राकृत तथा जैन प्राकृत मिश्रित अपभ्रंश है। लेख के साथ में मुकुट, स्वस्तिक, नद्यावर्त, अशोक वृक्ष आदि जैन सांस्कृतिक मांगलिक प्रतीक भी उकेरे हुए हैं। इस शिलालेख के प्रारंभ में ही चक्रवर्ती सम्राट खारवेल
अर्हत् वचन, जनवरी 99
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