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________________ पुरुष ही बनाते हैं। सराकों में पर्दा प्रथा नहीं है। मट्ठा बिलौने के लिये खड़ी होकर मट्ठा बिलौती हैं, बर्तन को पैर नहीं लगने देती हैं, न ही पानी के बर्तन को पैर लगने देते हैं। अपने नाम के आगे मांझी, मण्डल, लायक, सिंह, गायन, पात्र, वैष्णव, चौधरी लिखते हैं। कुछ लोग आचार्य, सराक, अधिकारी, रंगणी भी लिखते हैं। सराक जाति के गोत्र चौबीस तीर्थंकरों के नाम पर होते हैं जैसे आदिदेव, शांतिदेव, गौतम, धर्मदेव, सांडिल्य। कुलदेवता भगवान पार्श्वनाथ को मानते हैं। कुछ लोग महावीर भगवान को अपना कुलदेवता मानते हैं। कुछ के गोत्र ऋषभदेव, अनंतदेव, ब्रह्मदेव, पारासर भी मिलते हैं। रांची, सिंहभूमि जिले में सराक जाति तीन भागों में विभक्त है - मूल सराक, सिकरिया सराक एवं कड़ासी सराक। वर्तमान में मूल सराक एवं सिकरिया सराक दो भागों में विभाजित है। यहाँ आज भी सराक जाति के लोग ऋषभदेव स्वामी के बताये हुए मार्ग पर चलकर कृषि का कार्य करते हैं। सराक जाति के लोग सात लाख तक होंगे। बिहार, बंगाल, उड़ीसा में सराक जाति के 400 गांव हैं। रांची के गांव नौडी, तमाड, हूसण्डी, तड़ाई, नवाडीह, हराडीह, देवलटाण, आगसिया, चौपड़ी, चौंमाहाक, पारडीह में सराक बहुलता से रहते हैं, उनमें जैनधर्म के प्रति जागृति दिखाई देती है। उड़ीसा के सराक रंगिया कहलाते हैं जो कटक जिले के 51 गांवों में रहते हैं। पूरे उड़ीसा में 385 गांव हैं। रंगिया ही रंगणी कहलाते हैं। उड़ीसा प्रान्त के कुछ गांव जो कटक और बहरामपुर के पास है रंगणी जाति के जैनों का निवास है ये रुगडी, नआमाटणां, मणियावध, जरियाटणां, वालबीसी हैं, यह जानकारी डॉ. शचिराउतराय द्वारा कटक से मिली है। गोत्रों के हिसाब से देखें तो रंगणी जाति की गोत्रावली परवार जाति की गोत्रावली से बहत कुछ मिलती है - सराक और रंगणी गोत्र धन्धा परिवार गोत्र उड़िया - 1. अनन्त देव बजाजी ओछलमूर 2. खेमदेव बजाजी खोनामूर 3. काश्यप देव बजाजी कासल्यमूर 4. कृष्णदेव कोछलमूर बंगाल - 1. आदिदेव आदिमूर 2. अनंतदेव ओछलमूर 3. धर्मदेव धनामूर 4. काश्यपदेव कासल्यमूर - इसका विशेष परिचय जानने के लिये ब्रह्मचारी शीतलप्रसाद कृत 'प्राचीन जैन सराक इतिहास' देखें। यह उड़िया और बंगला भाषा में प्रकाशित है। इससे स्पष्ट होता है कि परवार समाज के कुछ लोग उडीसा और बंगाल प्रान्त में बसे थे। उड़ीसा और बंगाल प्रान्त में जो रंगणी जाति के लोग पाये जाते हैं उनके गोत्र परवार जाति के ही हैं उनसे भिन्न नहीं। इनमें कुलदेवता के रूप में जैन तीर्थंकरों के रूप में जैन तीर्थंकरों के नाम हैं तथा पूजे जाते हैं। सराक लोगों में धार्मिक जाग्रति के प्रति क्षु. गणेशप्रसाद वर्णी, ब्रह्मचारी शीतलप्रसाद, पं. बाबूलाल जमादार, श्री बैजनाथ सरावगी, श्री हरकचन्द पांड्या ने सराहनीय कार्य किया है। 1992 से पू. उपाध्याय श्री ज्ञानसागरजी ने जो अलख जगाया उससे सराक समाज में एक अनुपम ज्योति जगी है। उनकी प्रेरणा वरदान सिद्ध हुई है। महाराजश्री का प्रयास एक इतिहास होगा और अन्य गुरुओं के लिये प्रेरणा और अनुकरणीय कार्य होगा। प्राप्त - 8.10.98 20 अर्हत् वचन, जनवरी 99
SR No.526541
Book TitleArhat Vachan 1999 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnupam Jain
PublisherKundkund Gyanpith Indore
Publication Year1999
Total Pages112
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Arhat Vachan, & India
File Size8 MB
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