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भय रहता है। कोयले यदि बुझाये जाते हैं तो किसी गमले आदि पात्र को उलटकर उन पर रख दिया जाता था, पानी डालकर बुझाना निषिद्ध था, क्योंकि इससे अग्निकाय और जलकाय जीवों का संघात होता है।
सराक बन्धुओं के घरों में आटा, बेसन आदि अधिकांशत: हर सप्ताह ही पीसने का रिवाज और परम्परा है, किन्तु मिर्च मसाले का व्यवहार 1-2 माह तक चलता है। अवश्य ही इन्हें बड़े यत्न से रखा जाता है। घर की गाय का दूध, दही, घी ही अधिकांशतया काम में लाया जाता है। घी को लोंग डालकर कड़काया जाता है ताकि उसमें जीवोत्पत्ति न हो। इसी भांति चलित रस अर्थात् वस्तु जिसका स्वाद बदल गया हो, काम में नहीं लाई जाती है। कहीं-कहीं तो जीवदया का इतना सूक्ष्म विवेक रखा जाता है कि चाकू, छुरी आदि को तरकारी की टोकरी में नहीं रखा जाता है। मान्यता है कि आखिर वनस्पति जीव है और उसके अवचेतन में छुरी के प्रति एक अज्ञात भय है। ऐसे अनाज जिनमें लट, इल्लियाँ आदि पैदा हो गई हों उन्हें धूप में डालकर छांव में फैलाया जाता है ताकि बिना कष्ट के निकल जायें। आचार मुरब्बे भी अधिक अवधि रखे हुए नहीं खाये जाते, फफुन्दी लगे हुए अचार तो फेंक ही दिये जाते हैं।
रसोईघर को वास्तु कला की परम्परा के अनुसार सराक लोग बनाते हैं - 1. ईशान कोण में पानी रखने का स्थान बनाते हैं ताकि दिनभर पात्रों पर पूरी - पूरी धूप रहे और ___ पानी का स्थान सूखा बना रहे, सूक्ष्म जीवों का जमाव न हो सके। 2. रसोईघर दक्षिण - पूर्व या उत्तर-पश्चिम की ओर बनाये जाते हैं, इसके पीछे वैज्ञानिक कारण है।
80% हवायें दक्षिण - पश्चिम से उत्तर - पूर्व की ओर बहती हैं, जो वायु दुर्गन्ध को मकान से
दूर बहा ले जाती हैं। बैक्टीरिया, मच्छर आदि भी हवा के बहाव में आगे चले जाते हैं। . 3. रसोईघर के आगे या पीछे एक बरामदा बनाने की प्रथा है, इसका मुँह द्वार उत्तर या दक्षिण
पूर्व की ओर रहता है। 4. मकान को चारों ओर से खुला छोड़ते हैं। छोटे मकानों में भी कम से कम दो ओर वातायनी
रखी जाती है। खाना बन जाने के पश्चात आंगन से चौके तक कहीं भी जल नहीं रहने दिया जाता है।
जिस प्रकार हिन्दओं में 'अतिथि देवो भव' का आदर्श प्रचलित है. उसी प्रकार जैनियों में 'अतिथि संविभाग' का है। सराक के घर में किसी अतिथि विशेष कर स्वधर्मी बंधु का आना तो सुखद एवं उल्लासमय होता ही है। चूल्हे पर तवा चढ़ाते ही पहली रोटी कुत्ता, मेहतरानी, परायतनी (सड़क झाड़ने वाली) के लिये बनाई जाती है।
अन्य परम्पराएँ बहुत सात्विक तथा बेजोड़ हैं। बड़ा सुखद आश्चर्य होता है कि घोर मांसाहारियों, शराबियों के बीच रहकर भी ये सराक अपनी संस्कृति को कैसे बचाये हुए हैं। रसोई की क्रिया पर
यान दिया जाता है। स्त्रियाँ बगैर स्नान न भोजन बनाती हैं, न ही परोसती हैं. न ही कोई घर का सदस्य खाना खाता है। स्त्रियाँ रजस्वला होने पर 3 दिन तक भोजन नहीं बनाती और कोई वस्तु नहीं छती, पेशाब जाने के बाद शुद्धि करती हैं और शौच के उपरान्त स्नान अनिवार्य रूप से करती हैं। स्त्रियाँ जितनी बार भोजनशाला में प्रवेश करेंगी उतनी बार कपड़े बदलती हैं। घर के ज्येष्ठों के उपरान्त स्त्रियाँ भोजन करती हैं। घर से बाहर यात्रा पर जाने वाले सराक भाई पक्का भोजन साथ ले जाते हैं। होटल, रेल, बस का भोजन नहीं करते। मकान के दरवाजे अष्टमी, चतुर्दशी, अमावस्या, पूर्णिमा और अष्टान्हिका पर गोबरी से लीपे जाते हैं। सूतक-पातक का पूर्ण ध्यान रखा जाता है। सूतक 10 दिन का और पातक 13 दिन का मानते हैं। सूतक में स्त्री 30 दिन बाद बाहर निकलती है और 42 दिन के बाद भोजन बनाती हैं। पौष माह में तथा चैत्र माह में सीताफल (शरीफा), कद्दू नहीं खाते, माघ माह में लौकी नहीं खाते। साधुओं का भोजन
अर्हत् वचन, जनवरी 99