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________________ अर्हत्व कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ, इन्दौर वर्ष - 11, अंक 1 जनवरी 99, 21-28 उत्कल के जैन वंशज 'वर्तमान सराक' ■ रामजीत जैन आज भारत का जो हिस्सा 'उत्कल' के नाम से प्रख्यात है उसमें जैनियों की संख्या नाम मात्र है, किन्तु एक दिन ऐसा भी था जबकि जैन धर्म उत्कल का राष्ट्रीय एवं लोक धर्म था और महावीर काल से लेकर दूसरी सदी ई. पर्यन्त रहा। उसके उपरान्त महायानी बौद्ध धर्म तथा शैव धर्म का भी प्रवेश हुआ। बौद्ध धर्म वहाँ तीसरी से आठवीं सदी पर्यन्त बना रहा। तदुपरान्त बौद्ध एवं शैव धर्म के विकृत रूप तंत्रयान, वाममार्ग आदि का भी यहाँ प्रचार हुआ। इस समय तक जैन धर्म का यहाँ ह्रास हो चुका था। लेकिन फिर भी इतिहास से पता चलता है कि 12 वीं सदी में राजा उद्योत केसरी के समय जैनाचार्यों और जैन केन्द्रों को विद्यमानता थी। इसके साक्षी यहाँ से प्राप्त शिलालेख हैं । 10 वीं सदी में वैष्णव धर्म का भी प्रवेश हुआ। 12 वीं सदी में भुवनेश्वर जिले के पुरी स्थान में जगन्नाथ की प्रतिष्ठा होने के उपरान्त जगन्नाथ की उपासना ही इस प्रदेश का प्रधान धर्म हो गया। कोणार्क का सूर्य मंदिर सूर्योपासना की विद्यमानता का सूचक है। उड़ीसा गजेटियर के लेखक डब्ल्यू. एच. हन्टर के अनुसार इस देश के आदिमवासियों का धर्म भी जैन धर्म ही था, यहाँ के यवन राज्यों ने भी इसी धर्म को अपनाया। 10 वीं, 11 वीं सदी के उपरान्त यहाँ के जैनों ने द्रुत गति से स्वधर्म छोड़ा। जो फिर भी अडिग रहे, उनके वंशज सराकों के रूप में आज भी विद्यमान हैं। जैन धर्म की ऐतिहासिक भूमिका जैन धर्म की सम्पूर्ण जानकारी के लिये उसके अभ्युदय, प्रसार, प्राधान्य, देशीय परम्परा, संस्कृति, भूगोल, इतिहास, भाषा, साहित्य, आदि सम्पूर्ण विषयों का अनुशीलन एवं अनुशीलन के फलस्वरूप उसका वास्तविक रूप प्रकट करना आवश्यक है। अतः उत्कल में जैन धर्म का पर्यावलोचन करने के लिये सबसे पहले उपरोक्त प्रकार से विचार जरूरी है। - कलिंङ्ग एक बहुत पुराना देश है। पुराणों तथा धर्मग्रंथों में इसका वर्णन आया है। मिश्र, यूनान, तथा चीनी पर्यटकों के भ्रमण वृतान्त में भी इसका उल्लेख है। विभिन्न छ: राष्ट्रों के सम्मिश्रण से इस प्राचीन भूखण्ड का निर्माण हुआ है 1. ओड्रराष्ट्र, 2. कलिंग, 3 कंगोद, 4. उत्कल, 5. दक्षिण कोशल और 6. गंगराडी। ये छ: राष्ट्र कभी एक चक्रवर्ती के अधीन रहते थे तो कभी स्वाधीन हो जाते थे। लेकिन इन राष्ट्रों की संस्कृति और सभ्यता एक थी और एक ही क्रम के अनुसार इनका विकास होता रहता था । - वस्तुतः गंगा से लेकर गोदावरी तक और पूर्वी समुद्र से लेकर दण्डकारण्य तक उत्कल विस्तृत था। कालक्रम से दक्षिण कोशल का कुछ अंश उससे अलग हो गया और शेष का नाम त्रिकलिंग पड़ गया क्योंकि उसमें उत्कल, कंगोद, और कोसल ये तीन देश * एडवोकेट, टकसाल गली, दानाओली, लश्कर- ग्वालियर (म.प्र.)
SR No.526541
Book TitleArhat Vachan 1999 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnupam Jain
PublisherKundkund Gyanpith Indore
Publication Year1999
Total Pages112
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Arhat Vachan, & India
File Size8 MB
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