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________________ ५ ४ : ४ १४ ] प्रबुद्ध न જૈન તંત્રી : પરમાનંદ કુંવરજી કાપડિયા મુંબઇ : ૧૫ જુન ૧૯૫૨ રવીવાર मेरी भावना ( एक राष्ट्रीय नैतिक प्रार्थना ) [ रचयिता:- श्री. जुगलकिशोर जी. मुख्तार ] जिसने राग, द्वेष, कामादिक जीते, सब जग जान लिया । सब जीवों को मोक्ष मार्ग का, निस्पृह हो उपदेश दिया। बुद्ध, वीर, जिन, हरि हर ब्रह्मा, या उसकी स्वाधनि कहो । भक्ति भाव से प्रेरित हो, यह चित्त उसी में लीन रहो ॥ १ ॥ શ્રી મુખઇ જૈન યુવક સંઘનું પાક્ષિક મુખપત્ર विषयों की आशा नहिं जिन के, साम्य भाव धन रखते हैं । निज- पर. के हित साधन में, जो निश-दिन तप्तर रहते हैं । स्वार्थ त्याग की कठिन तपस्या, बिना खेद जो करते हैं । ऐसे ज्ञानी साधु जगत के दुःख- समूह को हरते हैं ॥ २ ॥ रहे सदा सत्संग उन्हीं का ध्यान उन्हीं का निल रहे। उनही जैसी चर्या में यह चित्त सदा अनुरक्त रहे । नहीं सताऊं किसी जीव को झूठ कभी नहीं कहा करूं । पर धन वनिता पर न लुभाऊं, संतोषामृत पिया करूं ॥ ३ ॥ अहंकार का भाव न रख्खूं, नहीं किसी पर क्रोध करूं । देख दूसरों की बढ़ती को कभी न ईर्षा भाव धरूं । रहे भावना ऐसी मेरी, सरल सत्य व्यवहार करूं । बने जहां तक इस जीवन में, औरों का उपकार करूं ॥ ४ ॥ मैत्री भाव जगत में मेरा, सब जीवों से नित्य रहे । दीन-दुखी जीवों पर मेरे डर से करुणा स्त्रोत बहे । दुर्जन- क्रूर कुमार्ग रतों पर क्षोभ नहीं मुझको आवे । साम्यभाव रखूं में उन पर ऐसी परिणति हो जावे ॥ ५ ॥ ચિત્ત ભયમુકત, ઉન્નત રહે મસ્તક, ज्ञानने नव रहे अवनी यां; જ્યાંહી ઘરઘરતણી સાંકડી વાડથી વિશ્વ શત ખંડમાં તૂટતું ના; માનવીશબ્દની સ્ફૂરણા સત્યના મુકિતનું દર્શન (દેશની સાચી વિમુક્ત દશાનું ગુરૂદેવ રવીન્દ્રનાથ ટાગોરે ગીતાંજલિમાં કલ્પેલું ચિત્ર ) ગહન ઉંડાણમાંથી થતી જ્યાં; યત્ન વણથાકતા બાહુ ઉન્નત કરે પૂર્ણતાને સદા પામવા गुण-जनों को देख हृदय में, मेरे प्रेम उमड़ आवे । बने जहां तक उनकी सेवा करके यह मन सुख पावे । होऊं नहीं कृतघ्न कभी मैं, द्रोह न मेरे उर आवे । गुणग्रहण का भाव रहे नित, दृष्टि न दोषों पर जावे ॥ ६ ॥ २७. नं. श्री. ४२६९. कोई बुरा कहे या अच्छा, लक्ष्मी आवे या जावे। लाखों वर्षों तक जीऊं, या मृत्यु आज ही आ जावे । अथवा कोई कैसा हो भय, या लालच देने आवे । तो भी न्याय-मार्ग से मेरा, कभी न पद डिगने पावे ॥ ७ ॥ होकर सुख में मन न फूले, दुख में कभी न घबरावे । पर्वत - नदी - श्मशान - भयानक अटवी से नहिं भय खावे । रहे अडोल अकंप निरन्तर यह मन दृढ़-तर बन जावे । इष्ट-वियोग अनिष्ट योग में, सहनशीलता दिखलावे ॥ ८ ॥ [ सुखी रहे सब जीन जगत् के कोई कभी न घबरावे । बैर- पाप अभिमान छोड़, जग नित्य नये मंगल गावें । घर-घर चर्चा रहे धर्म की, दुष्कृत दुष्कर हो जायें । ज्ञान, चरित उन्नत कर अपना, मनुज जन्म फल सब पायें ॥ ९ ॥ વાર્ષિક લવામ રૂપિયા ૪ ईति भीति व्यापे नहीं जग में, दृष्टि समय पर हुआ करें। धर्म-निष्ठ होकर राजा भी, न्याय प्रजा का किया करें। रोग-मरी दुर्भिक्ष न फैले, प्रजा शान्ति से जिया करे । परम अहिंसा धर्म जगत् में, फैल सर्व-हित किया करे ॥ १० ॥ ... • फैले प्रेम परस्पर जग में, मोह दूर ही रहा करे। अप्रिय कटुक कठोर शब्द, नहिं कोई मुख से कहा करे । बन कर सब 'युग- वीर हृदय से, देशोन्नति रत रहा करें। वस्तु स्वरूप विचार खुशी से, सब दुख संकट सहा करें ॥ ११ ॥ જ્યાંહી જડ રૂઢિની હૃદયને રૂંધતી શુક વેરાનની નાહિ પ્રજ્ઞાતણે! સ્વચ્છ ને નિળે નિત્ય ગતિશીલ સુવિચાર ને ક માં ત્યાં જ એ મુક્તિથી મહેકતા મુલ્કમાં, त्यां; અનુવાદક : યશવ’ત દાશી રેતમાંહી સ્રોતનિજ માર્ગ ભૂલે કદાપિ જયાં વિષ્ણુ, ચિત્તને આપ દા આજ મુજ રાષ્ટ્રને પ્રાણ જાગે
SR No.525937
Book TitlePrabuddha Jivan - Prabuddha Jain 1952 Year 13 Ank 17 to 24 and Year 14 Ank 01 to 16
Original Sutra AuthorN/A
AuthorParmanand Kunvarji Kapadia
PublisherMumbai Jain Yuvak Sangh
Publication Year1952
Total Pages204
LanguageGujarati
ClassificationMagazine, India_Prabuddha Jivan, & India
File Size19 MB
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