________________ Sad ता१२२-७-335 हिन्दी विभाग और राजपुताना में भी कई प्रान्तों में तथा अन्य देशों में जहाँ कि इस प्रथा का विस्तार नहीं है वहां कि खी-समाज तो सौभाग्य और सुन्दरता हीन हो होगो या बिना इस के हाथी दांत का चू डा. प्रयोग किये. यहाँ की बीयों का विवाह मंगलोत्सव होता ही (लेखक:-माणिकलाल अमोलकचन्द भटेवरा.)" नहीं होगा। इस का उपयोग न करने वाली जातियों तो * हमारे बापदादा जो कुछ करते आये हैं, भले ही अब अशुभ हो समझी जाती होगी। नहीं, नहीं, स्वम में भी नहीं, बह अछा हो या बुरा, उन्हों ने समझ कर किया हो या भूल हम प्रत्यक्ष देखते है और यह सव्य भी है कि वहाँ के पुरुष से, अब उसकी आवश्यकता हो या न ऐसी प्रथाओं से हमारी अपेक्षा अधिक बलशाली व दीर्घायु है। फिर ऐसा हमारा धर्म रहता हो या जाता; और यह क्यों है इसका हमें ज्ञान हो या न; परन्तु उस लकीर को बराबर पकड़े ___प्राचीन ऐतिहासिक व शात्रोक्त बातों को श्रवण करने रहमा हमने धर्म समझ रक्खा है। पुराने विचार के लोगों का से पता लगता है कि इष्टदेव व शंखेश्वरीदेवी हम पर अति कहना है कि हमारे बुजुर्ग जो कुछ करते आये हैं वह ठीक ही तुष्टमान थी और इसके परिणाम स्वरुप हम भी सब ही है। वह मूर्ख थोड़े ही थे, आजकल तुम्हें क्या मालूम ! प्रकार से प्रतिष्टित थे पर अब दुनिया के तले दबे हुए हैं कारण कि सौ-समाज हाथों में चूठे बंगड़ियाँ डालकर हम यूद्धि उस से विपरीत करें, तो बापदादाओं को मूर्ख बनायें - न युवक भी तो अपने बापदादाओं को मूर्ख नहीं ठहराते। . मन्दिर जैसे पवित्र स्थानों में जाकर भाशातना का कारण वे मानते हैं कि वे बड़े बुद्धिशाली एवं समयानुसार कार्य बनती है जिस के फल-स्वरूप देवी देवता भी हम पर से चलाने वाले बुजुर्ग थे, और प्रत्येक पद्धति को वे किसी उद्देश शुभ-दृष्टि विलग कर देते हैं इसो से तो हम अज्ञान के गहरे से चलाते थे, परन्तु वह जो कुछ भी कर गये हों यह सब गहर में गत हैं। हमारे आंख होते हुए हम अन्धे है। कान ठीक ही है, और वह भूल कर ही नहीं सकते थे, ऐसा नहीं। होते हुए भी दौर-गचनों का श्रवण करते हुवे भी बहरें बने हुवे हैं। लिखने का तात्पर्य केवल इतना है कि हम अपना इदय होते हुए भी शुमा शुभ का भेद मालूम नहीं बुद्धि को थोडा सा कष्ट दें। और अच्छी प्रकार सोच समझ कर सकते। पुरुष नाम धराते हुए भी पुरुषार्थ खो दिया। कर कार्य करें। भले ही वह पुरानी पद्धति के अनुसार हो . धर्म, समाज व देश के प्रतिपालक व स्तम्म स्वरूप पुरुषों * या उसमें कुछ नबीनता हो। यह कोई नहीं कहता कि, की जन्म-दात्री स्त्री-समाश के होते हुए भी देश समाज व बापदादों की सारी ही बातें छोड़ दो, लेकिन जो समाज व धर्म की शोचनीय अवस्था हो रही है। कारण एक मात्र धर्म के लिए जहर बन चुकी हो कम से कम उन्हे तो छूने न हमारी आत्मा का अनुन्धान क्यों कि आत्मोन्नति के माग में से भी डरना हमारा कर्तव्य है। पडे हुए है हिंसारूपी कांटे। इस में कोई संशय नहीं कि ऐसी ही एक प्रथा हमारे मारवाड़ देश की पूज्य देवि तुम इस चढे से होनेवाली हिंसा को बन्द कर, इतने मूक यों में वापदादाओं से चली आ रही है। मारवाड़ की दवियाँ प्राणियों की रक्षाकर उनकी शुभाशीष ले अपनी उन्नति न हाथीदांत की चूडिया एक सौभाग्य सूचक चिन्ह समझाती कर सको। (अपूर्ण) है। और बडे ही चान से हाथों में प्रायः कन्धे से लगाकर फलई तक पन्द्रह-पन्दह, बीस-बीस पहनती है। न जाने જન શિક્ષણ સંસ્થાઓને.. इस से कोई बुद्धि विशेष या सुन्दरता का भास होता हो / ..आया न समान २नी रागागा, E यो यामी, मने शिक्षण संस्थासची सुन्दरता सची शोभा तो ज्ञान में और शील धर्म में भी पालि भासिने मासे भासने है, न कि इन गहनों में। फिर भला हाथों को इन से कस- पास शिक्षeis alre बानी छे. मारे कर हमेशा के लिये क्यों कमजोर बना लिया जाय। और सत्याने। परियय भावानात गार पासमा भी हाथों में हाथीदांत के चूड़ो न होना एक अशुभ चिन्ह આવ્યા છે, તે બે પૈસાની ટીપ્ટ બીડી દરેક સંસ્થા નીચેના સરનામેથી તરત મંગાવી લઇ ભરી મેકWી ખા વાં. माना जाता है। यदि इस मान्यता में कुछ भी सत्यता का જાતિ કાર્યાલય, अंश प्रतीत होता हो तो गुजरात, दक्कन, बंगाल, पञ्जाब हवेली- योग, श१५२ भा. આ પત્ર મનસૂપ જોશ હીરાલાલ શા મને જેન કાદ પ્રિ પ્રેસ, ધનજી સ્ટ્રીટ, મુખઈ નું, કે માં છાયું છે. અને ગદાસ મમતાલિ શાહે “જૈન યુવકે સંપર્ક માટે 2-30, ધનજી સ્ટ્રીટ, મુછે કે, માંથી પ્રગટ કર્યું છે. पूण)