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________________ MMMNNNNN 'પ્રબુદ્ધ જેને. त०१५-७-33 हिन्दी विभाग. (पञ्चविसे) २८ वरनागरे २९ धाकड ३० कटनेरा ३१ पोखाड ३२ पोरवाड (जांगडा) ३३ पोवाड (जांगडावीसा) ३४ धवल जैन ३५ कासार ३६ बधेरवाल ३७ आयोध्यावासी दिगम्बर जैन जातिया। (तारन एन्थ) ३८ आयोध्यावासी ३९ लाड जैन १० (लेखक:--माणिकलाल अमोलकचन्द भटेवरा) कृष्णपक्षी ११ काम्बोज १२ समैय्या १३ असाटी ४४ संसार के किसी भी धर्म को लीजिये; उसमें आंतरिक दशाहूमड ४५ वीसाइमड ४६ पंचम ४७ चतुर्थ १८ वदनेरे भेदभाव, शाखाएँ प्रशाखाएँ तो होगी ही, जैसे कि बोटी २९ पापडीवाल ५० भवसागर ५१ नेमा ५२ नरसिंहपुरा में हीनयान, महायान, ईसाइयों में रोमन कैथोलिक, प्रोटेस्टेंट, बीसा ५३ नरसिंहपुरा वसा ५४ गुर्जर ५५ सैतवाल ५६ मुसलमानों में शिया, भुनी, जैनों में वेताम्बर, दिगम्बर, मेवाडा ५७ मेयाका (दसा) ५८ नागदा (बौसा) ५९ स्थानकवासी तेरापन्धी आदि । किसी भी धर्म का संस्थापक नागदा (बसा) ६० चितोडा (दसा) ६१ चितोडा (बीसा) तो संसार कै-समाज के भले के लिये ही धर्म का स्थापन १२ श्रीमाल ६३ श्रीमाल दसा ६४ सेलबार ६५ श्रावक ६६ करता है; वह स्वयं तो ये भेदभाव के बीज बो ही नहीं सादर (जैन) ६७ बोगार ६८ वैश्य (जैन) ६९ इन्द्र (जैन) सकता । फिर प्रश्न उठता है कि ये आंतरिक भेदभाव आये ७० पुरोहित ७१ क्षत्रिय (जैन) ७२ जैन दिगम्बर ७३ तगर कहां से ? मंगन करने से ज्ञान होता है कि प्रत्येक धर्म पर ७४ चौधले ७५ मिश्र जैन ७६ संकवाल ७७ खुरसाळे ७८ पडौसी धर्मों का और देशकालानुसार अन्यपरिस्थितियों का हर दर ७९ उपाध्याय '८० ठगर बोगार ८१ ब्राह्मण जैन प्रभाव पडता है। और इन प्रभावों और परिस्थितियों के अनुसार ८२ गांधी ८३ नाई जैन ८४ बढई जैन ८५ पोगरा जैन धर्म की आंतरव्यवस्था में परिवर्तन करने या न करने पर ८६ सुकर जैन ८७ महेश्री ८८ अन्य धर्मी. अस्तु. आपस में मतभेद हो जाता है और प्रत्येक पक्ष अपना कक्का कोई कोई शाखा में तो तीन तीन या चार चार तक ही खरा करने के लिये अपने को एक जुदा पन्थ मानने लगता घर हैं। और इतनी अल्पसंख्यक होने से बेटी व्यवहार का है। इस भेदभाव का फल यह होता है कि धर्म का असल क्षेत्र संकुचित होने के कारण वे बडी तेजी से नाश के मुँह में ध्येय (Goal) लुम हो जाता है और उसका स्थान रूढिया ले जा रही हैं, फिर भी धर्म डुबने के भवसे दूसरी जातियों से लेती हैं। बौद, ईसाई आदि धर्मों के समान जैन धर्म भी सम्बन्ध करके अपनी रक्षा नहीं कर सकती हैं। प्रति वर्ष अपने समयका एक मिशनरी धर्म है। ब्राह्मण (सनातन) धर्म जैन धर्म के अनुयायी कम होते जाते हैं। अगर अब भी न में चलती हुई घोर हिंसा और जाति भेद-उँच नीच भाव को संभले तो शायद बहुत ही थोडे वर्षों में जैन धर्म का अस्तित्व नाश करना ही जैन धर्म का उद्देश्य है । फिर भला जैन धर्म केवल इतिहास के पृष्टा पर ही रह जायगा । में ही जिस की दृष्टि में न कोई उँच न कोई नीच ही हो महावीर पुत्रो, जागों, अब तो इन अन्तभेदों को दुर करो सकता है, जातिभेद और उँच नीच भाव हो यह क्या कम और जैन धर्म की रक्षा करो। तथास्तु । आश्चर्य और दुख की बात नहीं है । - બેદષા એ દુભાઈ સાધે છે કે હું થયુ" છે? કેટલાકનું માનવું आज जैन धर्म के अनुयायियों की क्या दशा है। शनैः सारना हराना पसात शनैः ब्राह्मण धर्म की तरह उनमें भी सौ से अधिक शाखा निभाने श्रीमान मोक्षाचा सा३२ ४ 80 पाता ! प्रशाखाएं हैं । दिगम्बर जैनों में नौम्न लिखित जातिया :- daती श्री२ २३ २४ २ ગમારી મટી સંસ્થાના પૈસા તળીયા ઝાટક સાફ થઈ १ खंडेलवाल २ अग्रवाल ३ जैसवाल जैसवाल, (दसा) ५ परयार ६ पचायती परवार ७ परवार दस प प भार पाना पैसे से भारे मा नितिनी ८ परवार (चोसके) ९ पल्लीवाल १० गोलालारे ११ विनैक्या ये विमान ५।२ नयी ११ १२ नूतनजैन १३ ओसयाल १४ ओसवाल (बीसा) १५ नभुशे, भान पin 2 D१ मत શ્રીપાળ મહારાજને કેવા કષ્ટો વેઠવા પકવ્યા હતા? અમારી गंगेरवाल १६ बढेले १७ वरेण्या १८ फतेह पुरिया १९ दि. on प छी मसाथ नया माया माममना भार जैन २० पोरवाल २१ बुढेले २२ लोहिया २३ गोलसिंघारे भायात्रामारी शासन भाटनी मारली जनी प्रसा २४ खैरोचा २५ लमेचु २६ गोलापूर्व २७ गोलापूर्व - ( संधान ५, २६५ ७५२.) માં પત્ર મનસુખલાલ હીરાલાલ લાલને જૈન શાસકરેલ પ્રિન્ટીંગ પ્રેસ, ધન સ્ટ્રીટ, મુwછે ને, 8 માં યુ' છે. બને શૈદાસ મગાલ શાહે “જૈન યુવકે સંધ’ માટે ૨૬-૩૦, ધનજી સ્ટ્રીટ, મુંબઈ , માંથી પ્રગટ કર્યું છે,
SR No.525800
Book TitlePrabuddha Jivan - Prabuddha Jain 1933 07 Year 02 Ank 35 to 38
Original Sutra AuthorN/A
AuthorChandrakant V Sutaria
PublisherMumbai Jain Yuvak Sangh
Publication Year1933
Total Pages32
LanguageGujarati
ClassificationMagazine, India_Prabuddha Jivan, & India
File Size3 MB
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