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________________ २०२ ०८-७-33 हिन्दी विभाग. (७) किसीभी अज्ञान या निर्बल व्यक्तिद्वारा किये हुये अयोग्याचरणको गुप्त रीतिसे सुधार करना उचित है । परन्तु इंडो ढोगियों और समाजकी कमजोरीसे लाभ उठाने बालके जैनियो ! सच्चे जैनी बनो । असली रूपको प्रकट करके धर्म मार्ग को रखते हुये वृद्धि वर्तमान जैन समाज रूदिधर्म और दलबन्दी के कारण करना उचित है। क्षीण होता हुआ मृत्यु की तरफ अग्रसर हो रहा है। इसका (८) कोईभी व्यक्ति यहि धर्माचरणसे च्युत हो जाये कारण जैन-धर्म के वास्तविक रूप की अज्ञानता है। इसका तो उसे जैसे बने तैसे स्थिर करना उचित है। बहिष्कार एक मात्र उपाय हमारा सचा जैन बनना है। सच्चे जैनत्व करना उचित नहीं । को प्राप्त करके हम केवल जैन समाजमें ही नहीं किन्तु (९) सहधर्मियोंसे माँ बच्चे जैसा शुद्ध निष्कपट प्रेम समस्त संसारमें प्रेममय सुख, शान्ति का राज्य स्थापित रखना चाहिये । कर सकते हैं। (१०) प्रत्येक जैनका यह पवित्र कर्तव्य है, कि वह (१) आत्म स्वतन्त्रता जैन धर्मका प्रधान लक्ष्य है। जिस प्रकारसे होसके उस प्रकार संसारका अज्ञानान्धकार दूर वह ईश्वर की भी गुलामी स्वीकार नहीं करता, क्यों की करके धर-घर और कोने-कोनेमें वीर भगवान्के दिव्य सन्देश आत्मासे ही परमात्मा होजाना उसका मुख्य सिद्धान्त है। को पहुँचा कर जैन-धर्मके महत्वको जगद् व्यापी करदे । यह समानाधिकार का निर्मल और उच्चतम रुप है। समाजके सभी विचारवानों और विशेषतः उसाही (२) विचार या व्यवहार संकीर्णता के लिये जैन धर्ममें नवयुवकों से हमारी अपील है कि वे इस पवित्र कार्यमें सहकोई स्थान नहीं है । परस्पर विरोधी विचारों को निर्विरोध योग दें। जैन समाजके सच्चे कर्मवार सेवकोंके लिये यह करना ही स्याद्वाद है। मैं जो मानता हूँ वहाँ ठीक है, इसप्रकार एक बड़ा उपयुक्त क्षेत्र है। के हठको जैन धर्ममें एकान्तवाद, सा मिथ्यात्य (ठ) के चौधरी वसन्तलाल जैन, नामसे कहा गया है । नीचातिनीच दुःखमय परिस्थिति से सञ्चालक-जैन युवक संघ इटावा. जीव मात्र का उद्धार करना जैन धर्मका मुख्य ध्येय है। इस लिये प्रत्येक जैन को सहनशील और उदार होना आवश्यक है। . (३) जैन-धर्मके ध्येय और सिद्धान्तमें इतना दृढ शरीया तीर्थ सं घमा निश्चय होना आवश्यक है, कि जिससे बदनामी का डर, थापुर रेन संधना राव।. [लोक भय] स्वर्ग नरक का भव [ परलोक भय] तकलीफों का डर, मृत्यु भय, छिपी बातों के खुलने का डर, (गुप्त भय (1) शरी७ तीर्थ मनमा लाना Vागि अकेलेपन का डर, [अनरक्षा भय और आकस्मिक आदि છાપખુદી મને ધટીત વત’નથી જૈનાની રાગણી દુભાવી છે તે બદલ અાજની સભા સખત શબ્દોમાં किसी भी प्रकार के भयसे अपने मार्गसे विचलित न हो। તિરસ્કાર નહેર કરે છે, અને વધુમાં જંતા પૂર્વક ., (४) प्रत्येक जैनको लालच और स्वार्थ छोडकर अना માને છે કે શ્રી જેન કાંમ્બર મૂર્તિપૂજક શ્ચમના सक्त होकर जीव मात्रका उपकार करना चाहिये। હકને દરાદા પૂર્વક નૂકરાને પેથાડવાની જે પ્રવૃત્તિ Jણુ કરવામાં મુકી છે. પ્રતિ ન કરવો ઉદેપુર (५) प्रत्येक जैनकी अन्तर्दष्टि होनी चाहिये । किसीके . . गरेशन विनती ३२... बाह्यरूपको देखकर घृणा करना उचित नहीं है। (૨) ખીન્ન ભારતીય જૈન શ્વેતાંબૂર મૂર્તિપૂજક કામને (६) प्रत्येक जैन को विचास्थान-विवेकी और परीक्षा નેત્ર ગુજારે છે કે કેશરીયાજી તીર્થ માં પક્ષનુ" प्रधानी होना चाहिये । प्रचलित कुरीतियों और रूढियोंका દ્રશ્ય પંsષાના દસ્તકમાં જવા ન પામે તેવી દરેક अनुगामी न होना चाहिये ! अहितकर शाखो और भेषियों के પુરતી કાળજી લેવા, અને વધુમાં આવ્યું ક્રાણુની પેઢીને પણ્ માં કારેને વમૉ કોમ બંદોબરન કરવા बाद्यरूप को देखकर लभाना नहीं चाहिये। उनके अन्तरङ्गको તેમજ દુભાયેલી લાગણી શન કરવા જે જે યોગ્ય देखकर परस करो। ક્યાં લે ઘટે તે લેવા સુચના કરે છે. આ પત્ર મનસુખરામ હીરાલાલ વાધને જૈન ભારેય પ્રિન્ટીંગ પ્રેસ, ધન સ્ટ્રીટ, મુબઈ ન, . માં છાપ્યું છે. અને ગેકનદાસ મગનચાલ શાહે 'જૈન યુવક સંધ’ માટે ૨૬૩ ૧, ધનજી સ્ટ્રીટ, મુબઈ માંથી પ્રગટ કર્યું છે.
SR No.525800
Book TitlePrabuddha Jivan - Prabuddha Jain 1933 07 Year 02 Ank 35 to 38
Original Sutra AuthorN/A
AuthorChandrakant V Sutaria
PublisherMumbai Jain Yuvak Sangh
Publication Year1933
Total Pages32
LanguageGujarati
ClassificationMagazine, India_Prabuddha Jivan, & India
File Size3 MB
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