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________________ mะะะขvvvvะะะะะะะะะะจกสะะะะะะะะะะ /ะะะะะะะะะะะะะะะะะะะะะะะะ प्रभुन ता०२८-१-३ પિરવાડ જ્ઞાતિકા દિગદર્શન. सीधीधिराव धुंजय का उद्धार कराया था ! ऐसे बहुत से रत्न पोरवाट जाति में पैदा हुए हैं कि जिनका यदि 'पूर्ण इतिहास लिखा जाय तो बड़ा भारी अंथ बन जाय ! यहाँपर (हिम्मतमल रूपचंदजी) तो कुछ वारो का ही परिचय दिखाना ही उपयुक्त होगा। यह एक सटिका अविचल नियम है कि जो जितनी भाग्याटबंशीच वीर मीना, लेदरीने पाटनाधिपति बनराव उन्नति को मारा करता है वह एक बार उतनी ही अवनति चाचरे के सेनापति के पद रहकर बोरवीरता कार्य किये को प्राप्त देता है। डीक यही नियम प्रत्येक देश, धर्म, समाज वा इन्हा के पेश में ही विमलशा नाम के महादानेश्वरी एवं व्यक्ति उपर जीवन में एक नरकेशरी पैदा हुए थे कि जिन्होंगे फेयश पोरवाद शाति को अवश्य ही आता है, में जिस शाति का दिग्दर्शन पाठकों को ही नही परंतु सारे जैन समाज को उमति के शिखर चढा कराना चाहता हूं वह जाति भी इसी दशा को प्राप्त दिया था और उन के बनाये हुए भावु व कुम्मावाली के जिनालय सि भारत में ही नहीं 'परंतु उन्हों की शिक्षकला पोरयाद शब्द यह प्रावट जाति का अपभ्रंश है, इसके : युरोप-अमेरीका तक प्रसिदि पा की है, विमलशा के परिचय मूल स्थापक आचार्य श्री स्वयंप्रमासूरि (काधनाथ के पांचवे के लिये उन शुभ नाम हो पर्याप्त होगा, उग की वीरता, पट्टयर) थे। श्रीमालनगर के राजा व प्रजा को जन बना कर यता, धर्म र राष्ट्रसेवा किसी इतिहासशी से लीपा नहीं है! आप पावती नगरी, कि जहां का राजा पसेन किसी देवी जिन्हों की शौर्यता, वीरता, उदारता, परोपकारता, धर्म के उपसंग को शान्त करने के लिये अश्वमेध यह करनेवाला व राष्ट्रसेलारूस नीति जगतापल्यात है, जिन्होंने अपने असंख्य था उस पर अपने अतुल विद्यायलद्वारा अंतरमहले में ही हामी सद्कार्य में व्यय की है व नरसन चौरशिरोमणी वस्तु. पहुंच गये। पाल-तेजपाल इसो जाति में उत्पन हो कर, संसार को बता मुनि क्रिया से निवृत हो राजसभा में जाने के लिये दिया था कि जन धर्म कायरों का नहीं परंतु गुरवीरों का कार्दबद्ध हो गये। राजसभा में पहुंचते ही राजा व प्रजागे धर्म है। बाप का उचित सरकार किया ! सभाप मेक्षकों से चकारब जिन्होंने राणकपुरजी का भव्य जगविश्वात जिनालक भर, गया। राजा के पास यज्ञाचक्षक (बज्ञवाले मी बंधाने का सामाग्य प्राप्त किया ये इसी वंश के नग्न धना बेठे गये / सपथात् आचार्य देवने अपनी दिव्य वक्तृत्व शक्ति सा थे, और भी आसांसा असंख्य गसनाने धर्म, समाज द्वारा जनता के समक्ष “अहिंसा परमो धर्मः' का विस्त आर राष्ट्र की सेवा बजा कर जो सौभाग्य प्राप्त किया था विवेचन ऐसी शालीद्वारा किया कि वहां उपस्थित श्रोतागणों के वह भी इतिहास क्षेत्र में अपना गौरव बतला रहे है, कहाँ को वन साहस हरय भी कोमल हो गये। उन्हों को या जैसे उपरोक्त प्राग्वटवंशीय गरवारों की वीरता, शायता, परोपकारता, निर्दय पिष्ठुर कार्यपस्थे प्रणा उत्पन होने लगी। उदारता, धर्म य राष्ट्रसंचा आर कहाँ आज उपरोक्त भावना उसी यात राणा प्रधानादि 45000 घरोने सरिजी के को मंदता व दिनपरदिन घटती दुई संख्या और अंदर दी पास जन धर्म स्वीकार किया। सूरिजीने उनका नाम प्रावट पहेश-दाग्रहदि वंश से उपोषित किया। पोरवाट शाति के अग्रेसरो! अब उढ कर कर्मक्षेत्र - पोरवाट जाति को अंबिका देवी के दिये हुए स्गत में आगे पेर बढाओ और जनता के समक्ष अपने पूर्वजों का वरदानो को पोरवाटोने टोक चरितार्थ कर दिखाये थे। इतिहास उपस्थित करो कि अब भी हमारे में जो का सशदुर्गप्रदानेन, गुणसप्तरोपणात् / गौरव नसोनस में रस हुआ है। पुरसतव्यतोऽरि, प्राग्वट शाति विधुता // - अतएव उचति च अभ्युदय के लिये अपने पूर्वजों का आध प्रतिज्ञानिनाही, द्वितीय प्रकृतिः रिचरा। इतिहास को जागना प्रत्येक देश व शति के लिये अनिवार्य तृतीय पोदरपन, चतुर प्रज्ञा प्रकर्पवान् / है। किसी संग्रजी कपिने पडत हो टोक कहा है-- पंचम प्रपंचज्ञ, पष्टं प्रलं मानसम् / ससम् प्रभुताकाक्षी, प्रावट पुरससकम् // A people wh ch takes to pride in the (विमलचरित्रम्) achievements of remote aneesters will never . अर्थ--1) पशिशाका पालन करना (2) प्रकृति के स्थिर achieve anything worthy to be remembered अर्थात् धैर्यवत शांतपिश से कार्य करना (1) पांडवचन (0) with pritle by rimote descendents. बुद्धिमता (5) प्रपंचश-सर्व कार्य करने में कुशल (5) मन अर्थात् जो अपने पूर्वजों का बेष्ट काव्यों का अभिमान की मजबूती (प्रभुताकांक्षी) प्रभुत्ता प्राप्ति की इच्छाचाले। और स्मरण नहीं करती बह ऐसी कोई बात में कर सकती वि. सं. 174 के अदर जायगा और भावडशा नाम :ओ कि गहुत पीही पीछे उन की संतान से सगर्व स्मरण के रन पोरवाट शाति में उत्पन्न हुए थे कि जिहान पवित्र करने योग्य हो। . ! Printed by Talji Harsey Lalan at Mahendra Printing Press, Gaya Building Masjid Bunder Road Bombay, 3. and Pablished hy Shivlal Jhaverchand Sanghvi for Jain Yavak Sangh. at 26-30, Dhanji Street Bombay, 3.
SR No.525794
Book TitlePrabuddha Jivan - Prabuddha Jain 1933 01 Year 02 Ank 11 to 14
Original Sutra AuthorN/A
AuthorChandrakant V Sutaria
PublisherMumbai Jain Yuvak Sangh
Publication Year1933
Total Pages32
LanguageGujarati
ClassificationMagazine, India_Prabuddha Jivan, & India
File Size3 MB
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