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________________ ७२ . પ્રબુદ્ધ જૈન ०२४-१२-२ निधीसिहाथमें है? स्वामीने तो उत्तरपुराणमें इसपर बहस उठाकर इस प्रकारको इलीत भी दे डाली है कि की गाय और घोडके मेलसे न जो जीवनाचका कल्याण करनेवाला, नीचसे उँच बननेका गर्भ रह सकता है और घोडा वा बेल पेदा हो सकता है. रस्ता बतानेवाला और आत्मासे परमात्मा होनेका पाठ पढाने- इसी प्रकार अमरूदके पीजसे अनारकापेढ उत्पा नहि हो सकता वाला है, वही धर्म सबके ग्रहण करने योग्य सभा धर्म होस वास्ते इनकी जाति तो भित्र भिन्न जल है, परन्तु मनुष्योंमें सकता है, और ये सबबातें जैनधर्ममेंही पाई जाती है. इस तो आपसमें वह भेद नहि है, यही तो माहाणभी चमारीको पास्ते जैनधर्मको ही यह गारव प्राप्त है कि वह जीवमात्रका गर्भधारण करा सकता है और चमारभी ब्राह्मणीको गर्भवती कर सचा धर्म कईला सके । संसारके जीव अनादिकालसे संसार. सकता है, घोडे बार बेलम व अमस्य और अनारमें तो साफ भ्रमण करते हुए नाना प्रकारके दुःख उठा रहे हैं, यहाँ तककि साफ ऐसा भाकारभेद है कि हरकोई देखते ही बता सकता है, अनादिकालसे निगोद जैसी महानीच अवस्थामें पड़े रहकर कि यह घोडा है और यह बैल है, यह अमरूद है और यह अनन्तकाल व्यतीत कर रहे है. ओर करते रहे हैं। इस महा- अनार है, परन्तु भाह्मण, ग्रीय, वैश्य भादि मनुष्योंकी आह भीष अवस्थासे उत्थान करके यह जाव परमात्मापद प्राप्त कर- तिने ऐसा भेद नहि है. समीका मनुष्यके समान आकार है, सकता है और करता रहा है। यही जनधर्मका मुख्य सिद्धान्त तंब अन्य जाति-भेद भानना कैसे हो सकता है। है, नीचका उच्च बनाना भार उसे उचतम कोटितक पहुचरं सी प्रकार अन्यनी अनेक कयन दिगम्बर शाखोमें मोजूद देना, यही जैनधर्मका मुख्य काम है. परंतु शोकके साथ काना . परंत माज इसके दिगंबरोका यह दावा है कि जो जन्मसे पडता है कि आजकल जैनधर्मने ऐसा विकृतरूप धारण करालिया साह्मण, क्षत्रिय या वैश्य हो वही मोक्ष प्राप्त कर सकता है, है कि वह नीचको उँच बनाने के बदले उँच कहलाने वाली बहुत ही आवर्यजनक मालम होता है, यही नहि, आजकलतो जातियों की एक मात्र संपत्ति ही धनगरा है. दिगंबर जैन मुनियोंका बही एक धर्मप्रचार रह गया है कि शाइके संसारी जीव कंपाषवश सदा आपसमें लड़ते रहे हैं और हाथका और जो विधवाविवाह करते है उनके हाथका जल जो विजेता रहे है वह अपनेको उंच भार जिनको जीता है या पीना छोड दोगे तभी तुम धर्म ग्रहण करनेके पात्र बन सकोगे जिनपर काबू पाया है उनको नीच समझकर उनपर अनेक आर तभी हम तुमारे दायका माहार सकेंगे। मकारके अत्याचार करते रहे है। दशियों में तो यहाँ तक दस्तूर देखिये ! जीवमायका कायाण करनेवाला, पतित-पावन था कि जिनको लवाईमें जीततेचे, उनको मारकर साजातेये यह जैनधर्म कहांस कहाँ सेजाकर पटका गया है! कैसी उसकी और खुशी मनातेथे. बहुतसे मुस्कॉमे उनको बांदी, गुलाम दर्दशा की गई ! कहांलो दिगंबर जैनधर्मके परमाचार्य सामपगाकर दोरीकी तरह रखते थे और बेचतेथे. गुलामाकी येचनेका न्तम्भस्वामी यह बताते है कि चांडालकी ओलादभी यदि . यह प्रथा अब दुनियासे उठगई है. और इसको उठा देनेका अंगधर्मपर प्रदान से भाये तो देवोंके समान पूजनीय है, और श्रेय अमेरिका बालोको ही मास हुआ है. इसके लिए इनको कहा आजकलके हमारे दिगंबर साधु ऐसा भेदभाव कोलावे आपसमें महायुदतक करना पडा और आखिरकार अंतमें उन्होंने फिरते है! ऐसी दशामें यदि विचारयानों को अपने स्वतंत्र विचार इस पृणित प्रथाको दुनियांसे उठाकर ही छोडा. . और धर्मपर होता हुआ यह अन्याय प्रकट करने का मोका न यह श्रेय तो उनको जरूर प्राप्त हुवा, ओर इसके लिये मिले तो फिर आपही जान सकते है कि उसका परिणाम सारी दुनिया उनकी भाभारी भी रहेगी. परंतु मीच और इंचके क्या होगा। चापि मैं बेताम्यर संप्रदायकी सभी कते माननेका इस भूतका अमेरिकाके गारोंके हृदयपर इतना गहरा प्रभाव है, तयार नहि है, क्योंकि समयकी हेरफेर से उनमेंभी बनेक विष्टबि .गुलामांची सन्तानोको, चाहे वे इदि में. विधाम, धनमें लियां आगई है. तो भी हत्यसे उनका गुणानुवाद गामेसे नदि 'आर सम्यतादि सभी बातोमें चाहे जितने ऊंचे हो गये हो रह सकता हूं. क्योंकि उनमें और चाहेको कुछ होगया हो, नीच ही गिनते है. और अपने होटलोमें, किरायेकी मोटरोमें परंतु दिगवरोके समान यह विकार नहि आया है. जिसने तथा औरभी तुलसी जगहों में उनको स्थान देने तकाको तैयार जैनधर्मको धमकी कोटिसे ही निकालकर नीचे गिरा दिया हैनहि होते है। व अबतक खुले शब्दाम यह मानते है कि शन, यहांतक कि मनुष्यका अभिमान उसको आपही अपमानित करदेवा अस्पच अद और नो भादि सभी मनुष्य उसी प्रकार मोक्ष है. इसीकारण जिन अमरीका चालाने इतना श्रेय प्राप्त कियाधा पा सकते है और मोक्ष पानेकी कोशिष कर सकते है. जिस वही अपने इस अभिमानके कारण स्वयं अपमानित हो रहे हैं। प्रकार कोइराण, क्षत्रिय था वैश्य, इससे यह कहा जा इसी प्रकार जो लोग अपने कुलाभिमानके कारण अपने सकता है कि सच्चे धर्मका जो लक्षण है यह अस्तक वेतांवरो में कोही धर्मका अधिकारी मानकर दूसरोंको नीच मानते और मौजूद है. और दिगंवरीने उसको दिया है, और यदि कोई निशान बाकी रहमी गया है तो जीजानसे उसके मिटानेकी उनको धर्मसे वंचित रखना चाहते है, क्या वे अपनेको और कोशिपकी जा रही है. ऐसी हालतमें यदि यह कहा जाप कि अपने चर्मको अपमानित नहीं करते है। इस वक्त धर्मकी कशी मोतांपरोकेही हाथमै रह गई है तो भाइयो! मैने दिगम्बर सम्प्रदायमें जन्म लिया है और कुष्ठ वेजान होगा। आदिपुराण आदि दिर्गवर शाखीमें यहपडा हैं कि सर्वमनुष्योंकी - भाइयो इस मामले में यदि मुझो आपमें इर्षा उत्पन्न हो एक मनुष्यही जात है, जिसमें भिन्न भिक्ष, आजीविका भार तो कोई आश्रयं नहि, आपको यह मौका प्राप्त है कि धर्मका भिन्न भिन्न कोंक करनेसे मित्र भेद हो गये है. श्री गुणभद्र (मनुसथान भार 0g . १४) Printed by Lalji Harrey Lalan at Mahendra Printing Press, Gaya Building Masjid Bunder Rod Bombay, 3 and Published 'hy hivial Jha verebari Sanghvi for Jain Yuvak Sangh. at 26-30, Dhanji Street Bombry,3.
SR No.525793
Book TitlePrabuddha Jivan - Prabuddha Jain 1932 12 Year 02 Ank 06 to 10
Original Sutra AuthorN/A
AuthorChandrakant V Sutaria
PublisherMumbai Jain Yuvak Sangh
Publication Year1932
Total Pages42
LanguageGujarati
ClassificationMagazine, India_Prabuddha Jivan, & India
File Size4 MB
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