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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir SHRUTSAGAR _February-2017 ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या नेह नानास्ति किञ्चन । आ श्रुतिनुं ज्ञान होत तो तमे असत् नु संरक्षण करवानुं मने कहेत ज नहि. आ अवसरहीन अने प्रस्तुत विषय पर अरुचिकर अने क्रोध करनारा तेनां वचनो सांभळीने राजानां मनमां घणु लागी आव्यू. राजाए क्रोध करीने सेवकने आज्ञा करी के, युवराजे मारुं अपमान कर्यु छे. माटे तेने दररोज पांच खासडां मारवा. पितानां हुकम प्रमाणे भद्रकने दररोज मार खावो पडतो हतो. सुमती दररोज भद्रकनी आवी अवस्था देखीने शोक करवा लागी. एक दिवस राजपुत्री सुमती पेला महात्मानी पासे ब्रह्मज्ञाननी चर्चा करती हती तेवामां राजपुत्र भद्रक पण महात्मानी पासे आव्यो अने नमस्कार करीने ब्रह्मचर्चा करवा लाग्यो. ब्रह्मज्ञाननी चर्चाथी भद्रकने घणो आनंद मळतो हतो, ए अवसरे सुमति मनमां कंई विचार करीने महात्माने विनववा लागी के - हे महात्मन् ? आपनो शिष्य राजपुत्र भद्रककुमार, आपना आपेला ब्रह्मज्ञान उपरथी दररोज पांच खासडांनो मार खाय छे. कृपा करीने हवे मारा बन्धुनु दुःख टाळो. आप ज्ञानी छो, आपनी कृपाथी मारा भाईनु दुःख टळी जशे एम आशा राखं छु अने लोकोमा जे आपना शिष्यनी हेलना थाय छे, ते आपनी ज थाय छे एम हुं मानुं छु, माटे कांइ उपाय करीने मारा भाईने खासडांनो मार पडे छे ते बंध करावो. राजपुत्री सुमतिनां आवां वचनो श्रवण करीने महात्मा बोल्या के, हे सुमति ! तेरा भ्राता पंच जुत्तेका मारा खाता है सो न्यायकी बात है. जो मनुष्य यारोकी बात गमारो में करता है उसकु... पंच जुतिका मार पडना चाहिये. ब्रह्मज्ञानकी बात ब्रह्मज्ञानके अधिकारीओ के लिये है. तेरा बन्धु ब्रह्मज्ञानकी बात व्यवहार कार्यो में करता है इस लिये उसकुं व्यवहार अकुशलता से पंच जुतेका मार पडता है. वह बराबर न्यायकी बात है. राजपत्री तम लकडी है किन्तु योरोंकी बात गमारो में नहि करती है इस लिये तं ब्रह्मज्ञानका आनंद पाती है; फिर व्यवहार दशा में भी तिरस्कार नहि पाती है. महात्माना उपरना वचनो राजपुत्री सुमतिना हृदयमां बराबर उतरी गयां अने तेथी ते राजपुत्र भद्रकने कहेवा लागी के.. भाई ! ... आ बाबतमां महात्माना वचन प्रमाणे तुं व्यवहारकुशल नहि होवाथी ब्रह्मज्ञानी होवा छतां पांच खासडानो मार खाय छे. ज्ञानीओनां अनुभवज्ञाननी वातो अधिकारी जीवो आगळ करवानी होय छे. जो तुं व्यवहारकुशळ होत तो तारी आवी दशा थात नहि. माटे हवे दुनियानी रीति प्रमाणे अंतरथी न्यारा रहीने वरतवानी टेव पाड; के जेथी ब्रह्मज्ञाननी हेलना न थाय. अनधिकारीने प्राप्त थयेलां ब्रह्मज्ञानथी, ब्रह्मज्ञाननो लोको तिरस्कार करे छे अने तेथी ब्रह्मज्ञानी गांडा जेवा दुनियामां गणाय छे. For Private and Personal Use Only
SR No.525319
Book TitleShrutsagar 2017 02 Volume 09
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiren K Doshi
PublisherAcharya Kailassagarsuri Gyanmandir Koba
Publication Year2017
Total Pages36
LanguageGujarati
ClassificationMagazine, India_Shrutsagar, & India
File Size11 MB
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