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वि.सं.२०६८-द्वि. भाद्रपद माता को कष्ट हो रहा है, तो उन्होंने अपनी माता के सुख के लिये अपना हलन-चलन बन्द कर दिया। माता त्रिशला द्वारा गर्भपालन में रखी गई सावधानियों का भी पूज्यश्री ने वर्णन किया। भगवान महावीर का जीवन चरित्र सुनने एवं माता त्रिशला के गर्भ के समय देखे गये स्वप्नों की झांकी दर्शन हेतु काफी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे। भगवान महावीर जन्म वांचन का कार्यक्रम बहुत सुन्दर ढंग से सम्पन्न हुआ। सपनों की बोली में कई लोगों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। प्रभुजी के पारणा का लाभ श्रीमती फाल्गुनीबेन कमलेशभाई शाह,
आंबावाडी परिवार ने लिया । __ पर्युषण के छठे दिन भगवान महावीर के पावन जीवन प्रसंगों के सम्बन्ध में पूज्य आचार्यश्री ने कहा कि भगवान महावीर का जीवन हमें प्रेरणा व शिक्षा देता है कि हम अपने परिवार के सदस्यों के साथ कैसा व्यवहार करें। प्रभु का जीवन एक आदर्श जीवन था। वर्द्धमान मित्रों के साथ खेलते हैं किन्तु उनके अन्तर में उदासीनता ही रहती है। संसार से उदासीन होते हुए भी माता-पिता की इच्छा पूर्ति हेतु यशोदा के साथ विवाह भी करते हैं। माता-पिता की मृत्यु के पश्चात् संसार त्याग करने की आज्ञा बड़े भाई नन्दीवर्द्धन से मांगते हैं तब नन्दीवर्द्धन उन्हें एक वर्ष और रुकने के लिये कहते हैं, वहाँ भी बड़े भाई की आज्ञा का पालन करते हुए एक वर्ष और संसार में रहने को तैयार हो जाते हैं। संसार का त्याग करते समय पत्नी और पुत्री का जरा भी विचार किये बिना चल देते हैं और उनकी पत्नी भी राह में खड़ी होकर प्रार्थना नहीं करती है कि अब मेरा क्या होगा? कितना बड़ा उदाहरण है, परिवार प्रेम का? __पर्वराज पर्युषण के सातवें दिन वर्तमान जैन संस्कृति के आद्य तीर्थंकर आदिनाथ भगवान, पार्श्वनाथ भगवान आदि तीर्थंकरों के जीवन प्रसंगों का वर्णन करते हुए परम पूज्य राष्ट्रसन्त ने कहा कि इन महापुरुषों के जीवन वृत्तान्त से हमें शिक्षा लेनी चाहिए और अपने मानव जीवन को धन्य बनाने हेतु मोक्षमार्ग का अनुसरण करना चाहिए।
महापर्व पर्युषण के अन्तिम दिन पूज्य आचार्यश्री ने कल्पसूत्र का वाचन किया और प्रसंग सम्बन्धी चित्रों के द्वारा श्रद्धालुओं को समझाया । श्रमणों-श्रावकों के योग्य आचरण का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए पूज्यश्री ने कहा कि हम पूर्व में यह चर्चा कर चुके हैं कि मोक्ष की प्राप्ति हेतु हमें किस प्रकार का आचरण करना चाहिए? और क्या नहीं करना चाहिए? पूज्य आचार्य भगवन्त ने कहा कि जैन दर्शन में धर्म का प्राणतत्त्व क्षम है। मैत्रीभावना-करुणा-दयालुता-उदारता-परोपकारिता आदि वृत्ति क्षमा के पारिवारिक सदस्य हैं। पर्युषणपर्व में सामायिक-प्रतिक्रमण, आराधना-साधना के द्वारा हम अपना हृदय निर्मल बना चुके हैं। संसार के समस्त प्राणियों के प्रति दया-करुणा का भाव हृदय में धारण किया है, मन में मैत्री और प्रेम का प्रवेश हो चुका है, अपने अपराधों को स्वीकार करना, भविष्य में अपराध न हो ऐसी भावना रखान, पापमय प्रवृत्तियों का त्याग करना क्षमाशील व्यक्तियों के लक्षण हैं। यदि भवभ्रमण से आत्मा को मुक्त करना हो तो क्षमा के भाव अपने व्यवहार में आचरण में धारण करना होगा।
पूज्य आचार्यश्री ने कहा कि मिच्छामि दुक्कड़ आनादिकालीन महामंत्र है, इस महामंत्र में ऐसी शक्ति है कि यदि एकबार निर्मल हृदय से संसार के समस्त प्राणियों के प्रति मिच्छामि दुक्कड़ कहा जाए तो भवभ्रमण से मुक्ति मिल सकती है। अनादिकालीन कर्मों के बन्धनों को तोड़ने में सक्षम यह महामंत्र मोक्षप्रदायक है। क्षमा आध्यात्मिक औषधि है, मानसिक आरोग्य की प्राप्ति में दिव्य औषधि की तरह कार्य करता है, चित्त की शान्तिसमाधि प्राप्त करने का एक सरल उपाय है।
पूज्य श्री राष्ट्रसन्त की निश्रा में प्रतिदिन प्रातःकालीन एवं संध्याकालीन सामायिक प्रतिक्रमण में सैकड़ों साधक उपस्थित होकर आत्म साधना करते रहे। मन्दिर में प्रतिदिन आकर्षक आंगी की गई। श्री महावीर जैन आराधना केन्द्र, कोबा की ओर से साधकों के आवास एवं भोजन की सुन्दर व्यवस्था की गई थी। मुनिश्री पुनीतपासागरजी एवं मुनिश्री भुवनपासागरजी ने किया अट्ठाई तप
परम पूज्य राष्ट्रसन्त आचार्य श्री पद्मसागरसूरीश्वरजी महाराज साहब के प्रशिष्य एवं गणिवर्य श्री प्रशांतसागरजी महाराज साहब के शिष्य मुनिश्री पुनीतपद्मसागरजी महाराज साहब एवं पूज्य राष्ट्रसन्त आचार्य भगवन्त के शिष्य मुनिश्री भुवनपद्मसागरजी महाराज साहब ने पर्वाधिराज पर्युषण में अट्ठाई तप निर्विघ्न पूर्ण किया। पूज्य आचार्य भगवन्त की निश्रा में दोनों मुनिवरों ने आठ दिनों का उपवास रखकर अपने पूर्वोपार्जित कर्मों की निर्जरा की है। दोनों मुनिश्री ने पहली बार अट्ठाई तप किया है।
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