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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir श्रुत सागर, कार्तिक 2052 (आचार्यश्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर ग्रंथावलोकन .. का कम्प्यूटराइजेशन प्रोजेक्ट योगनिष्ठ आचार्य श्रीमद् बुद्धिसागरसूरीश्वरजी कृत कर्मयोग ग्रंथ श्री महावीर जैन आराधना केन्द्र संचालित आचार्यश्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर में द्वितीय तल पर आर्यरक्षितसूरि शोधसागर (कम्प्यूटर केन्द्र) स्थित | भारत वर्ष जिस समय गुलामी की जंजीरों को तोड़कर स्वतंत्र होने के | लिए लालायित था. उसी समय आत्मा के पारतंत्र्य से स्वतंत्रता प्राप्त करने है. यह केन्द्र एक सर्वर सहित आठ कम्प्यूटर, एक स्केनर, तीन प्रिन्टर से सुसज्जित है, ज्ञानमंदिर में स्थित दो लाख से ज्यादा हस्तप्रतों तथा लगभग 80 के लिए धर्मनेता भी प्रयत्नशील थे. इन दोनों प्रकार का नेतृत्व एक महान जैनाचार्य ने किया था जिनका नाम 125 ग्रंथों के प्रणेता के रूप में बड़े ही हजार मुद्रित प्रतों एवं पुस्तकों के विशाल संग्रह से सम्बन्धित विविध सूचनाओं आदर के साथ लिया जाता है वे हैं -तत्त्व-मर्मज्ञ.विद्वन्मर्धन्य योगनिष्ठ जैनाचार्य को इन कम्प्यूटरों के द्वारा उपलब्ध कराये जाने की योजना है. श्रीमद् बुद्धिसागरसूरीश्वरजी महाराज. सभी ग्रन्थों एवं उनमें अन्तर्निहित कृतियों का कम्प्यूटराइजेशन एक बहुत मानव समाज को पतन के गर्त में जाते वे देख न सकें.लोक जागरण वड़ा प्रोजेक्ट है. कम्प्यूटर की सहायता से हम किसी भी पुस्तक का प्रकाशन के लिए वे जनता के बीच गए. अपने प्रवचनों एवं उपदेशों के साथ ही उन्होंने नाम, कृति नाम, लेखक, टीकाकार, सम्पादक, संशोधक, अनुवादक, विषय, कलम भी उठाई. कलम की शक्ति सभी जानते ही हैं. उन्होंने क्रांतिकारी विचारों प्रकाशक आदि के आधार पर कुछ ही क्षणों में सम्पूर्ण सूचना प्राप्त कर सकते द्वारा मानव समाज को जगाने का पूरा प्रयास किया. 'कर्मयोग ग्रंथ उनकी हैं जो रजिस्टरों अथवा कार्डों द्वारा प्राप्त नहीं हो पाती. कर्ता की गुरू परम्परा | क्रांतिकारी विचारधारा का ही फल था. जिस किसीने भी इस ग्रंथ का अनुशीलन की माहिती एकत्र करनी भी इस प्रोजेक्ट का एक विशेष भाग है.प्रकाशन सिरीज | किया है वह आश्चर्यचकित हो जाता है. तथा विषयों के आधार पर भी पुस्तकों की शोध की जा सके इसके लिए यहाँ मूल कर्मयोग प. पू. गुरूदेव ने 272 संस्कृत श्लोकों में लिखा है जिस कार्य चल रहा है.एक पुस्तक में अन्य कई असम्बद्ध कृतियाँ भी प्रकाशित होती| पर उनकी खद की गुजराती भाषा में विस्तृत व्याख्या है. इस व्याख्या का सुगठित हैं. इनके विषय में परम्परागत पद्धति में सूचना प्राप्त करना दुष्कर हो जाता | संक्षिप्त अनुवाद प.पू.आचार्यश्री पद्मसागरसूरि म. सा. की प्रेरणा से हिन्दी है, लेकिन इस प्रकार की रचनाओं के लिए पेटा-कार्ड योजना बनाई गई है. भाषा में आपश्री के विद्या व्यसनी प्रशिष्य गणिवर्य श्रीदेवेन्द्रसागरजी के सत् इसके अन्तर्गत ऐसी सभी कृतियों के अलग-अलग कार्ड भरे जाते हैं, जिनका | प्रयासो द्वारा किया गया है.. कम्प्यूटरीकरण करने से इनके कृति नाम, कर्ता तथा आदिवाक्य से यह कृति योगनिष्ठ गुरूदेव आचार्यश्री बुद्धिसागरसूरि महाराज ने श्रीमद्भगवद्गीता किस ग्रंथ में तथा किन पृष्ठों पर है यह सूचना सरलता से उपलब्ध हो जाती | का छः वार अध्ययन किया था. उनकी दृष्टि उदार और समन्वयवादी होते है. अभी तक मुद्रित प्रतों एवं पुस्तकों के लगभग 75 प्रतिशत कार्यों तथाहुए भी शास्त्रीय थी. इस ग्रंथ में कर्म के सिद्धान्तों का व्यावहारिक जीवन में 37,000 हस्तप्रतों के विवरण को कम्प्यूटर में प्रविष्ट किया जा चुका है. अभी | विनियोग करने पर बल दिया है.जैन एवं हिन्दू परिभाषा में कर्म शब्द विभिन्न लगभग 1,75,000 हस्तप्रतों के विवरण कम्प्यूटर में प्रविष्ट करने बाकी हैं. अर्थों में प्रयुक्त हुआ है. योगनिष्ठ गुरूदेव ने इस ग्रंथ में 'कर्म' शब्द की जैन कम्प्यूटर सेवा के लिये श्री महावीर जैन आराधना केन्द्र परिसर में | एवं हिन्दु परिभाषाओं का बहुत ही सुन्दर समन्वय किया है. कर्म शब्द का LAN (Local Area Network) स्थापित किया गया है. इस कारण परिसर (शेष पृष्ठ 3) में स्थित किसी भी कक्ष अथवा भवन में स्थित कम्प्यूटर पर कोई भी सूचना पर उपलब्ध सभी सूचनाएँ देवनागरी, गुजराती, गुरुमुखी (पंजावी), आसामी, प्राप्त की जा सकती है एवं किसी भी कम्प्यूटर द्वारा सूचनाओं की प्रविष्टि वंगाली, ओरिया, तमिल, तेलगु, मलयाली, कन्नड, रोमन, रशियन आदि लिपियों की जा सकती है. Transcript Card (Gist Card) द्वारा इस केन्द्र में कम्प्यूटर में भी देखी जा सकती हैं. (शेष अगले अंक में) बधाई : Book Post / Printed Matter 0 "ज्ञानमंदिर के इस नये प्रयास हेतु हार्दिक शुभकामनाएँ. श्रुत सागर पत्रिका अपने लक्ष्य की पूर्ति कर समस्त संघ के लिए लाभदायी सिद्ध होगी, ऐसा विश्वास है." - प. पू. पं. प्रवर प्रद्युम्नविजयजी म. सा. 0 "आचार्यश्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर द्वारा श्रुत सेवा के लिए प्रारम्भ | To की गई पत्रिका श्रुत सागर निरन्तर प्रगति करे एवं लोकप्रिय वने ऐसी हार्दिक कामना." -श्री शांतिलाल मोहनलाल शाह, ट्रस्टी, श्रीमहावीर जैन आराधना केन्द्र If undelivered please return to : Shrut Sagar Printed at: Naishadh Printers, Naranpuragam, Ahmedabad-380013 7471627 Published by: Secretary, Shree Mahavir Jain Aradhana Kendra, Koba, Gandhinagar-382009.0(02712)76204,76205,76252 Sri Mahavir Jain Aradhana Kendra Koba, Gandhinagar- 382 009 (India) RAM For Private and Personal Use Only
SR No.525251
Book TitleShrutsagar Ank 1995 10 001
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoj Jain, Balaji Ganorkar
PublisherShree Mahavir Jain Aradhana Kendra Koba
Publication Year1995
Total Pages4
LanguageGujarati
ClassificationMagazine, India_Shrutsagar, & India
File Size1 MB
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