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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir श्रुत सागर, कार्तिक २०५२ कर्मयोग ग्रंथ सुभाषित (पृष्ठ ४ का शेष) प्रयोग उन्होंने अनासक्त भाव से करने योग्य कर्त्तव्य के अर्थ में किया है और कर्मयोग का सरल अर्थ गृहस्थ या साधुजीवन के लिए कर्त्तव्य बोध के रूप जहा सुई ससुत्ता, पडिया वि न विणस्सइ । में बताया है. उनका कथन है कि आत्मा के शुद्ध स्वरूप का साक्षी भाव से एवं जीवे ससुत्ते, संसारे न विणस्सइ ।। दर्शन किया जाना चाहिए. कर्मयोग ग्रंथ में कर्ताने अपनी उदार, विशाल और व्यापक दृष्टि से प्रवृत्ति (२९-५२, उत्तराध्ययनसूत्र) और निवृत्ति, कर्मयोगी के लक्षण, कर्मयोग की आवश्यकता - महत्ता, कर्मयोग जिस प्रकार धागे में पिरोई हुई सुई यदि हाथ से किसी स्थान पर गिर की लौकिक क्रियाएँ, लोकोत्तर कर्म, आत्मा का स्वभाव, गुरूवंदन-प्रतिक्रमणभी जाये तो वह धागे से युक्त होने के कारण नष्ट नहीं होती, खो नहीं जाती. प्रत्याख्यान आदि आवश्यक क्रियाएँ, विवेक, उद्यम, फर्ज, सत्य, हर्ष, शोक, उसी प्रकार ज्ञानरूपी सत्र (धागे) से यक्त आत्मा संसार में नष्ट भ्रष्ट नहीं होती. आत्मा, परमात्मा, गुरू-शिष्य, क्रोधादि कषाय, ब्रह्मचर्य, श्रद्धा, सेवा संकल्प, खो नहीं जाती. मानवता, परोपकार, सदाचार, मैत्री आदि चार भावनायें इत्यादि अनेक विषयों की विस्तृत चर्चा प्राचीन, अर्वाचीन, पौराणिक, ऐतिहासिक आदि दृष्टान्त देकर तथा पूर्वाचार्यों के ठोस वचनों का उदरण देकर की है. यह ग्रंथ वास्तव में सभी साधु-साध्वियों एवं श्रावकों के लिए पठनीय है, अरिहंत, सिद्ध, साहू, केवलिकहिओ सुहाबहो धम्मो।। श्लोक सरल संस्कृत भाषा में हैं. गुजराती व्याख्या का हिन्दी अनुवाद बहुत ही धारावद्ध लगता है. विषय का क्रम कहीं भी टूटता नहीं है, एए चउरो चउगइहरणा सरणं लहइ धन्नो।।। ___लोकमान्य तिलक ने इस ग्रंथ के विषय में प. पू. गुरूदेव को लिखा था [चउसरण पयन्ना, आचार्य श्रीवीरभद्रजी]] - “मुझे ज्ञात रहता कि आप कर्मयोग लिख रहे हैं तो मुझे मेरा कर्मयोग लिखने अरिहंत, सिद्ध, साधु तथा केवली परमात्मा के द्वारा कथित धर्म की शरण की आवश्यकता ही न रहती. आपके कर्मयोग के सामने मेरा कर्मयोग नहीं शाश्वत सुख को देने वाली है. ये चारों शरण नरक, तिर्यंच, मनुष्य तथा देव टिक सकेगा." ग्रंथनाम : कर्मयोग, कर्ता : योगनिष्ठ आचार्य श्रीमद् बुद्धिसागरसूरि, इन चारों गतियों का नाश कर मुक्ति देने वाली है; किन्तु कोई विरला धन्य अनुवादक : गणिवर्य श्री देवेन्द्रसागरजी महाराज, प्रकाशक : अष्टमंगल व्यक्ति ही इन शरणों को स्वीकार कर पाता है. फाउण्डेशन, अहमदाबाद, वर्ष : १९९४, मूल्य : रु. ३५१/-. . ओई विरला धन अनुवादक : गाव Best Wishes for a Happy & Prosperous New Year Sohanlal Chowdhary Chairman Santosh Maize & Industries Ltd. - Santosh Starch Products Ltd. Santosh Securities Ltd. Sohanlal Gautam Mahavir Chowdhary Charitable Trust, Alunedabad Sri Mahavir Jain Aradhana Kendra, Koba, Gandhinagar Sri Siwana Jivdaya & Manav Sewa Samiti, Alimedabad. Vice Chairman Sri Laxmi Co-Operative Bank Ltd., Ahmedabad Board Member Rajasthan Sewa Samiti, Ahmedabad • TheGujarat Research & Medical Institute, Ahmedabad Trustee Sri Jain Swetamber Nakoda Parswanath Tirth, Mewanagar, (Raj. Sri Jaistmer Lodrapur Parswanath Jain Swetamber Trust, Jaislmer Office:71. NewCloth Market, Ahmedabad-380002 Resi. : 13, Mahavir Society, Nr. Gajrawala Flats, Paldi, Ahmedabad - 380 007 Phones : (0)2141933,2142854. (R)6639300,6639301.1 (F)5890071,5890072,5890073. Fax: (Factory)5890060. (Res.)411884. Telex: 121-6117 SOHN IN For Private and Personal Use Only
SR No.525251
Book TitleShrutsagar Ank 1995 10 001
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoj Jain, Balaji Ganorkar
PublisherShree Mahavir Jain Aradhana Kendra Koba
Publication Year1995
Total Pages4
LanguageGujarati
ClassificationMagazine, India_Shrutsagar, & India
File Size1 MB
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