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________________ संस्कृत छाया : रागद्वेषवशया(त्वया)अशुभफलमासीत् यत्कृतं कर्म । तस्य वशात् सुन्दरि ! सम्प्राप्ता (तव) व्यसनरिज्छोली ।।१९।। गुजराती अनुवाद : राग-द्वेषने वश थइ जे कंइ अशुभ कर्म करायुं हशे तेना कारणे हे सुंदरी! आवी दुःखनी परंपरा प्राप्त थइ छे. हिन्दी अनुवाद : राग-द्वेष के वश में आकर जो कोई अशुभ कर्म किए गए उसी के कारण हे सुन्दरी! यह दुःख की परम्परा प्राप्त हुई है। गाहा : एवं गएवि जं देवि! एत्य कुवम्मि निवडिया एवं । संपत्ता तं मन्ने अनण्ण-पुण्णोदओ कोवि ।।१०।। संस्कृत छाया : एवं गतेऽपि यद् देवि ! अत्र कूपे निपतिता एवम् । सम्प्राप्ता तन्मन्येऽनन्यपुण्योदयः कोऽपि ।।१०।। गुजराती अनुवाद : आवी प्रतिकूळताओ आवी, तुं आ कुवामां पडी, ते छतां आ प्रमाणे ताटो समागम थयो तेथी कोई अपूर्व पुण्योदय छे तेम हुं मानुं छु हिन्दी अनुवाद : ऐसी प्रतिकूलताएँ आईं, तुम कुएं में गिरी, उसके बाद इस प्रकार तुम्हारा समागम हुआ, यह सब किसी अपूर्व पुण्योदय से हुआ है, ऐसा मैं मानता हूँ। गाहा : पडिकूड-कारिणावि हु विहिणा विहियं तु एत्तियं लढें । जं अक्खय-देहाए तुमए सह संगमो विहिओ ।।१०१।। संस्कृत छाया :प्रतिकूलकारिणाऽपि खलु विधिना विहितं तु एतावल्लष्टम् । यदक्षतदेहया, त्वया सह सङ्गमो विहितः ।।१०१।।
SR No.525096
Book TitleSramana 2016 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShreeprakash Pandey, Rahulkumar Singh, Omprakash Singh
PublisherParshvanath Vidhyashram Varanasi
Publication Year2016
Total Pages186
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Sramana, & India
File Size14 MB
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