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कारक प्रकरण का तुलनात्मक अध्ययन : कच्चायन और पाणिनि व्याकरण के आलोक में
डॉ. श्वेता जैन
पालि व्याकरण के रूप में कच्चायन व्याकरण तथा संस्कृत व्याकरण के रूप में पाणिनि व्याकरण का प्रमुख स्थान है। पालि और संस्कृत के पल्लवन का काल और क्षेत्र समान होने से इसकी व्याकरणिक विषय-वस्तु भी प्रायः सदृश है। संज्ञा, संधि, कारक, समास, कृदन्त, तद्धित, तिङन्त, सुबन्त, उणादि प्रकरण दोनों व्याकरणों में विवेचित हैं। कच्चायन व्याकरण को विदेशी विद्वान् प्रो. ए.सी.बर्नेल ने ऐन्द्र परम्परा का व्याकरण सिद्ध किया है और पाणिनि व्याकरण माहेश्वर परम्परा से सम्बद्ध है, यह लोकप्रसिद्ध है। कच्चायन व्याकरण प्रकरणानुसारी एवं स्वाभाविक है जबकि पाणिनि व्याकरण अपने विशिष्ट क्रम से सुगठित होने से क्लिष्ट प्रतीत होता है। प्रस्तुत शोध-पत्र में कच्चायन व्याकरण के कारकप्रकरण की पाणिनि व्याकरण से तुल्यता निरूपित की गई है। कच्चायन व्याकरण चार कप्पों (कल्पों) तथा २३ परिच्छेदों में विभाजित है- १. संधि कप्प २. नाम कप्प ३. आख्यात कप्प ४. किब्बिधान कप्पा नाम कप्प का विभाजन कई कण्डों (काण्डों) में है। इसी के अन्तर्गत कारक, समास और तद्धित कप्प है, जो स्वतन्त्र कप्प की तरह रखे गए है। कच्चायन व्याकरण में सूत्रों के साथ वृत्ति भी दी गई है। कारकप्रकरण में प्रत्येक सूत्र के साथ वृत्ति में उदाहरण भी प्रस्तुत किए गए हैं। पाणिनि ने अष्टाध्यायी में मात्र सूत्र ही दिए है। अष्टाध्यायी के प्रथम अध्याय के चतुर्थ पाद में कारक विषयक ३३ सूत्र एवं कर्मप्रवचनीय संज्ञा के १६ सूत्र है। प्रथम सूत्र ‘कारके' है, जिसके अधिकार में अपादान, सम्प्रदान, करण, अधिकरण, कर्म तथा कर्ता के क्रम से कारकों का विवेचन हुआ है। इन कारकसूत्रों के पूरक के रूप में अष्टाध्यायी के द्वितीयाध्याय के तृतीय पाद में ७३ सूत्रों के अन्तर्गत विभक्तियों का विचार किया गया है। इसमें 'अनभिहिते' के अधिकार में क्रमशः द्वितीया, चतुर्थी, तृतीया, पंचमी तथा सप्तमी विभक्तियों के प्रयोग स्थलों का निदर्शन किया गया है। इसके बाद 'अनभिहिते' अधिकार से भिन्न प्रातिपदिकार्थ मात्र में होने वाली प्रथमा विभक्ति का विधान करके पाणिनि ने 'शेष' में षष्ठी का निरूपण किया है। इसप्रकार १२२ सूत्रों में पाणिनि ने कारक को व्यवस्थित किया है जबकि कच्चायन ने मात्र ४५ सूत्रों में कारकप्रकरण को समेट लिया है।