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________________ हिन्दी अनुवाद : इधर पद्मराज का जीव एक सागरोपम की आयु पूरी कर इस जम्बूद्वीप के ऐरावत क्षेत्र में विजयनगर में धनभूति के पुत्र सुधर्म नाम से जन्म लिया । वहाँ भी श्रमणधर्म स्वीकार कर दूसरे देवलोक में उत्पन्न हुआ। गाहा : चंदज्जुणे विमाणे ससिप्पहो नाम सो सुरो जाओ । दो चेव सागराई संपुत्रं आउयं तस्स ।। ५३ ।। संस्कृत छाया : चन्द्रार्जुने विमाने शशिप्रभो नाम सः सुरो जातः । द्वौ चैव सागरौ सम्पूर्णमायुष्कं तस्य ।। ५३ ।। गुजराती अनुवाद : त्यां चन्द्रार्जुन नामना विमान मां शशीप्रभ नामनो बे सागरोपमनां आयुष्य वाळो देव थयो । हिन्दी अनुवाद : वहाँ वह चन्द्रार्जुन नाम के विमान में शशिप्रभ नाम का दो सागरोपम आयुष्यवाल देव हुआ। गाहा : भद्द ! विहुप्पह! संपइ विमाण सामी उ सो सुरो तुम्ह । जस्साए सेण तुमं समागओ मह समीवम्मि ।। ५४ । । संस्कृत छाया : भद्र! विधुप्रभ! सम्प्रति विमानस्वामी तु स सुरस्तव । यस्यादेशेन त्वं समागतो मम समीपे । । ५४ ।। गुजराती अनुवाद : हे भद्र विधुप्रभ! ते देव तमारा विमाननो स्वामि छे जेना आदेश थी तूं मारी पासे आव्यो छे । हिन्दी अनुवाद : हे भद्र विधुप्रभ ! वह देव तुम्हारे विमान का स्वामी है जिनके आदेश से तूं मेरे पास आया है।
SR No.525094
Book TitleSramana 2015 10
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSundarshanlal Jain, Ashokkumar Singh
PublisherParshvanath Vidhyashram Varanasi
Publication Year2015
Total Pages170
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Sramana, & India
File Size15 MB
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