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________________ महावीर कालीन मत-मतान्तर : पुनर्निरीक्षण : ७३ अथवा रहने वाले) शैवालोपासक (शैवाल से सम्बन्धित), सुहस्ति (हस्ति से सम्बन्धित), शंखपालक (सांख्य से सम्बन्धित, गाथापति (गाथा से सम्बन्धित) आदि कुछ समीकरण शब्दों की व्याख्या अवश्य कर सकते हैं। भगवतीसूत्र में महावीर के साथ जीव, लोक, मोक्ष सम्बन्धी विवाद करने वाले यह तीर्थिक भी दार्शनिक प्रतीत होते हैं। यद्यपि सिद्धान्ततः यह सभी दर्शन जीवन के प्रश्नों और उसके समाधान में एक दूसरे से सम्बद्ध भी प्रतीत होते हैं। अन्य तीर्थकों की सूची में ही कुछ उल्लेख और प्राप्त होते हैं जिन्हें विषयभोगों में लीन कहा गया। उदाहरण के लिए आरण्णिया (आरण्यक), आवसहिया (आवसयिक) आवास बना कर रहने वाले), गामंतिया (ग्रामन्तिक-ग्राम में डेरा बनाकर रहने वाले), कण्हईराहस्सिया (गुप्त स्थानों में रहने वाले)४४। सभी प्रावादकों को अधर्मस्थान में समाविष्ट बताते हुए अधर्मस्थान में मनुष्यों का भी उल्लेख किया गया, जो अधार्मिक, अधर्मिष्ठ, पापयुक्त कर्मों से अपनी जीविका उपार्जित करते हैं।४५ धर्मस्थान में अनगार (गृहत्यागी) अपरिग्रही, धर्मशील, रागादि से रहित श्रमण पर्याय का पालन करते हैं। इसके पश्चात् मिश्र पक्ष७ (मीसगस्स विभंगे) का भी उल्लेख करते हैं, जिसमें ऐसे मनुष्य होते हैं, जो श्रमणोवासगा) होते हैं, और निग्रंथ प्रवचन का उल्लंघन नहीं करते हैं। इस मार्ग को सर्वदुःखों का नाश करने वाला एकत्त सम्यक् एवं उत्तम कहा गया।८। इन विवरणों से ऐसा प्रतीत होता है कि धर्म और मिश्र स्थान ही उचित माना गया, बाकी सभी वाद मिथ्या थे। धर्म और मिश्र स्थानों में ही बार-बार परिव्राजकों, वानप्रस्थी तापसों, प्रवजित श्रमणों, ब्राह्मण और क्षत्रिय परिव्राजकों और श्रमणों का उल्लेख जैन साहित्य करता है। इनके साथ-साथ मनुष्य रूप में उत्पन्न कुछ निश्चित आहार करने वाले, गौतम (ठिगने बैल के द्वारा प्रदर्शन कर भिक्षा माँगने वाले), गौव्रतिक, (गौसेवा करने वाले) गृहधर्मी (गृहस्थ),धर्मचिन्तक, अविरुद्ध (विनयाश्रित भक्तिमार्गी), विरुद्ध (अक्रियावादी), वृद्धतापस श्रावकों को मृत्यु के उपरान्त वानव्यन्तर देवपद प्राप्त होने का उल्लेख प्राप्त होता है।४९ फिर वानप्रस्थों की सूची में पैंतीस वानप्रस्थी तापसों५° का उल्लेख औपपातिक सूत्र तथा अड़तीस वानप्रस्थी तापसों का उल्लेख भगवतीसूत्र५१ करता है। सर्वप्रथम दोनों का सम्मिलित उल्लेख देखते हैं(१) होत्तिया (होतृक, हवन करने वाले), (२) पोत्तिया (पोत्रिक, वस्त्रधारी), (३) कोत्तिया (कोतृक, भूमि पर शयन करने वाले), (४) जण्णई (यज्ञकी, यज्ञ से जीवन उपार्जन करने वाले), (५) सड्डई (श्राद्धकि), (६) थालई (स्थनकि, भोजनपात्र रखने वाले), (७) हुंबउट्ठा (कुंडिकाधारी), (८) दंतुक्खलिया५२ (दंतोवोलूखलिक, दांतों के द्वारा चबा कर खाने वाले), (९) उम्मज्जगा (उन्मजुक, Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.525057
Book TitleSramana 2006 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShreeprakash Pandey
PublisherParshvanath Vidhyashram Varanasi
Publication Year2006
Total Pages170
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Sramana, & India
File Size8 MB
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