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________________ गाहा : पिय-विरह-पीडियं तं तुडि-गय-निय-जीवियं मुणेऊणं । तदुक्ख-दुक्खिया हं समागया तुम्ह पासम्मि ।।१९१।। छाया : प्रिय-विरह पीडितं तां त्रुटि-गत-निज-जीवितां ज्ञात्वा । तदुःख-दुःखिताऽहं समागता तव पार्श्वे ।। १९१।। अर्थ :- प्रियना विरहथी पीडित पोताना प्राणने पण संकटमां मूकेली तेणीने जाणीने तेना दुःखथी दुःखी थयेली हुं तारी पासे आवी छु। हिन्दी अनुवाद : - प्रिय के विरह से पीड़ित, खुद के प्राणों को भी संकट में डाली हुई उसे जानकर उसके दुःख से दु:खी बनी हुई मैं तुम्हारी पास आई हूँ। गाहा: एवं कुसुमसराओ अइगरुयं आगयं महं वसणं । जं तीए दुक्खियाए अहंपि अइदुक्खिया चेव ।।१९२।। छाया : एवं कुसुमसराद् अतिगुरुक-मागतं मम व्यसनम् । यत् तया दुःखितया अहमपि अतिदुःखितैव ।।१९२।। अर्थ :- आ प्रमाणे कुसुमबाणथी मने बहु मोटु कष्ट आव्यु छे, कारण के तेणीना दुःखथी हुँ पण अति दुःखी छु । हिन्दी अनुवाद :- इस प्रकार कुसुमबाण से मुझे बड़ा कष्ट हुआ है क्योंकि उनके दुःख से मैं भी अति दु:खी हूँ। गाहा : ता सुयणु! कणगमाला जा सा नीसास-सोसिय-सरीरा। . आसासिज्जउ वरई जाव न सासा समप्पंति ।।१९३।। छाया : तस्मात् हेसुतनो! कनकमाला या सा निःश्वास-शोषित-शरीरा | आश्वास्यतां वरति यावद् न श्वासान् समाप्यते ।।१९३|| अर्थ :- तेथी हे सुतनु ! ज्यांसुधीमा ते कनकमाला निःसासा वड़े सूकायेला देहवाळी पोताना श्वासने समाप्त न करे त्यांसुधीमां ते बीचाटीने आश्वासन अपावतु जोइए। हिन्दी अनुवाद :- अतः हे सुतनु! जब तक कनकमाला निः श्वासों द्वारा शुष्क देहवाली अपने श्वास को समाप्त न करे तब तक हमें उस बेचारी को आश्वासन देना चाहिए। 115 For Private & Personal Use Only Jain Education International www.jainelibrary.org
SR No.525055
Book TitleSramana 2005 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShreeprakash Pandey
PublisherParshvanath Vidhyashram Varanasi
Publication Year2005
Total Pages280
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Sramana, & India
File Size12 MB
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