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७० : श्रमण/जनवरी-जून २००२ संयुक्तांक देवी की बलि चढ़ाने के संकट में पड़ जाते हैं। किसी प्रकार उनका बचाव होता है। माता-पिता उन्हें खोज कर उनका विधिवत् विवाह कर देते हैं। एक समय वसन्त ऋतु में वन-विहार करते समय उन्हें उस जैन मुनि से उपदेश सुनने को मिला जो कि पूर्वभव में नर हंस को मारने वाला व्याघ्र था। उससे प्रभावित होकर उन्हें संसार से विरक्ति हो जाती है और अन्त में वे दोनों प्रवज्या लेकर जैनधर्म स्वीकार करते हैं। अन्त में सुव्रता कहती है, वही तरंगवती मैं सुव्रता आर्या हूँ।
उक्त आत्मकथा उत्तम पुरुष में वर्णित एवं अद्भुत शृङ्गार-कथा है, जिसका अन्त धर्मोपदेश में हुआ है। इसमें करुण-शृङ्गारादि अनेक रसों, प्रेम की विविध परिस्थितियों, चरित्र की ऊँची-नीची अवस्थाओं, बाह्य तथा अतसंघर्ष की स्थितियों का बहुत स्वाभाविक और विशद वर्णन किया गया है। काव्य-चमत्कार अनेक स्थलों पर मिलता है। भाषा प्रवाहपूर्ण एवं साहित्यिक है। देशी शब्दों और प्रचलित मुहावरों का अच्छा प्रयोग हुआ है। सन्दर्भ १. द्रष्टव्य सूत्र १३०, उद्धृत- जगदीशचन्द्र जैन, प्राकृतसाहित्य का इतिहास,
द्वि०सं०, वाराणसी १९८५ ई०, पृ० ३२३. २. द्रष्टव्य ३, पृ० १०९, उद्धृत, वही, पृ० ३२३. ३. द्रष्टव्य गाथा १५०८, उद्धृत, वही, पृ० ३२३.
तरंगलीला की भूमिका में उद्धृत, पृ० ७. कुवलयमाला, पृ० ३, गाथा २०.
तिलकमञ्जरी, श्लोक २३. ७. सुपासनाहचरिय, पूव्वभव, गाथा ९. ८. किसी-किसी ने इस कथा का नाम 'तरंगलोला' लिखा है। ९. . प्रभावकचरित, पृ० २८-४०.
इसके रचयिता वीरभद्र आचार्य के शिष्य नेमिचन्द्रगणि हैं, जिन्होंने मूल कथा के लगभग १००० वर्ष बाद यश नामक अपने शिष्य के लिए इसे लिखा था। नेमिचन्द्र के अनुसार पादलिप्त ने तरंगवती की रचना देशी भाषा में की थी, जो अद्भुत रससम्पन्न एवं विस्तृत थी और केवल विद्वद्योग्य थी (लेखक के सम्बन्ध में अन्य वृत्त अज्ञात है)। जर्मन विद्वान् अर्नेस्ट लायमन ने इसका जर्मन भाषान्तर प्रकाशित किया है। इस भाषान्तर का गुजराती अनुवाद भी पहले पत्रिका में और बाद में पुस्तक रूप में प्रकाशित हो चुका है।
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