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डॉ० सांगरमल जैन द्वारा गुणस्थान-सिद्धान्त के विकास क्रम की गवेषणा :
जो १० आध्यात्मिक अवस्थाएँ दी हैं वे सम्यग्दर्शन प्राप्त होने के पश्चात् की ही हैं, जिनमें क्रमश: असंख्येय गुणी निर्जरा होती है। इन १० अवस्थाओं का आधार कर्मनिर्जरा है, अत: यह आवश्यक नहीं कि ये सारे ही गुणस्थानों के नाम हों। उपशमश्रेणी एवं क्षपकश्रेणी में पृथक् आरोहण के सिद्धान्त का विकास किस प्रकार हुआ यह शोध का विषय है। गुणस्थान-सिद्धान्त वर्तमान काल में कर्म-सिद्धान्त से ऐसा घुल-मिल गया है कि उसे पृथक् करके देख पाना कठिन हो जाता है। इन दोनों सिद्धान्तों की पारस्परिक निकटता का प्रतिपादन स्वयं डॉ० सागरमल जैन ने सप्तम अध्याय में किया है। ऐसा प्रतीत होता है कि गुणस्थान-सिद्धान्त के व्यवस्थित रूप में अस्तित्व में आने के पश्चात् कर्म-ग्रन्थ एवं पञ्चसंग्रह ग्रन्थों के माध्यम से विपुल साहित्य का निर्माण हुआ, जो समस्त कर्म-सिद्धान्त को गुणस्थानों के आधार पर विवेचित करता है। आठ कर्मों की उत्तर प्रकृतियों की गणना तत्त्वार्थसूत्र में उपलब्ध है; किन्तु उनके बन्ध, उदय, उदीरणा एवं सत्ता के रूप में गुणस्थानों को आधार बना कर जो वर्णन उत्तरकालीन कर्म-साहित्य एवं षट्खण्डागम की धवला टीका में प्राप्त होता है वह आचार्यों के द्वारा विहित प्रतीत होता है। आचार्यों ने प्राचीन मान्यताओं को आधार बनाकर गणितीय रूप में इनका वर्णन किया होगा। इसका तात्पर्य है कि गुणस्थान-सिद्धान्त के व्यवस्थित स्वरूप के स्थापित होने के पश्चात् ही कर्म-सिद्धान्त एवं उत्तरप्रकृतियों का सूक्ष्म-विवेचन प्रारम्भ हुआ होगा। अनेक थोकड़े भी आज उसी के परिणाम हैं। डॉ० सागरमल जैन द्वारा किये गये विश्लेषण का एक परिणाम यह अवश्य आया है कि उन्होंने इस सिद्धान्त के उल्लेख-अनुल्लेख के आधार पर एवं उसके विकास-क्रम के आधार पर अनेक जैन ग्रन्थों का पौर्वापर्य सिद्ध कर दिया है। इससे दिगम्बर एवं श्वेताम्बर ग्रन्थों की पूर्वापरता भी स्पष्ट होती है। तत्त्वार्थसूत्र एवं उसके भाष्य के रचयिता भी उमास्वाति ही सिद्ध होते हैं। डॉ० जैन ने अत्यन्त सूक्ष्मता के साथ जैन-ग्रन्थों का पौर्वापर्य निर्धारित किया है, जो महत्त्वपूर्ण है; किन्तु जैन अंग-आगमों में गुणस्थान शब्द का प्रयोग नहीं मिलने के कारण क्या यह माना जावे कि सारे अंग-आगम तत्त्वार्थसूत्र के पूर्व निर्मित हो गये थे? दूसरी बात तत्त्वार्थसूत्र में जिन १० अवस्थाओं का उल्लेख है वे भी अंग-आगमों में प्राप्त नहीं है। मैं समझता हूँ डॉ० सागरमल जैन इससे सहमत नहीं होंगे कि वर्तमान सभी आगम तत्त्वार्थसूत्र के पहले के ही हैं। अत: गुणस्थान शब्द के उल्लेख-अनुल्लेख के आधार मात्र से
पूर्वापरता का निर्धारण पुनः चिन्तनीय है। ८. इसमें कोई सन्देह नहीं है कि डॉ० सागरमल जैन ने शोधार्थियों को एक नयी दिशा
दी है। उनकी शोधदृष्टि नितान्त मौलिक है, परन्तु यहाँ यह ध्यान में रखना होगा
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