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पूज्यश्री के प्रवचन
- मूलचंद बोथरा, कोविद
पूज्यपाद श्रीमद विजयलब्धि सूरीश्वर जी म. ने पूज्य गुरुदेव की निश्रा में प्राप्त ज्ञानानुभूति को जन सामान्य में प्रवाहित किया। पूज्यश्री सहजता व सरलता के साथ विषय का प्रतिपादन किया करते थे। एक शब्द, एक वाक्य, एक श्लोक, एक प्रसंग से प्रवचन की शुरुआत करते थे। विश्व शांति, धार्मिकता, अहिंसा, शिक्षा, मानव धर्म, मानवता, सेवा, प्राणी मात्र के प्रति प्रेम आदि विषयों पर धीर-वीर-गंभीर प्रवचनों के श्रृंखलाबद्ध प्रसंग जुड़े हैं। " लुधियाना" नामक व्याख्यान पुस्तिका पूज्य श्री के प्रवचनों का दस्तावेजी संग्रह है। महातमेकरूपता, सा विद्या या विमुक्तये, ही और भी, कंठे सुधा वसति वै भगवज्जनानां भक्तिः तीर्थकृतां नतिः प्रशमिनां चत्तारि परमंगाणि आदि सैकड़ों प्रवचनों के क्रम ने लाखों लोगों को प्रभावित किया था। मूर्तिमंडन, देवद्रव्यसिद्धि, अविद्याधंकार आदि अनेक प्रवचन चिरस्मरणीय हैं और भविष्य के मार्गदर्शक हैं। पू. आचार्यश्री अपने प्रत्येक प्रवचन में नए श्लोकों, काव्यों की यथा प्रसंग तत्काल रचना कर अपनी असाधारण कवित्व शक्ति का परिचय देते थे। दिल्ली में राजर्षि टंडन से मुलाकात में तत्काल रचित ११ श्लोकों का पुष्प भेंट किया। टंडन जी ने गद्गद् होकर आशुकवि की विलक्षण प्रतिभा को सहर्ष प्रणाम किया था। द्वादशारनयचक्र के विमोचन समारोह में वयोवृद्ध आचार्य भगवंत ने संस्कृत में धारा प्रवाह प्रवचन देकर हजारों लोगों के साथ लब्धप्रतिष्ठ दार्शनिक, तत्वचिन्तक उपराष्ट्रपति डा० राधाकृष्णन् को मंत्रमुग्ध कर दिया था। पूज्य प्रवर के प्रवचन आज भी प्रेरक हैं, मार्गदर्शक हैं जिसके कुछ संग्रहीत अंश यहाँ प्रस्तुत हैं:
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शाश्वत सुख : हे युवकों, सांसारिक कल्पनाजन्य सुखों का परिणाम घोर दुःख का कारण बनता है। आज जो पदार्थ प्रियकर लगता है जिसे इष्ट मानते हैं वही पदार्थ परिणामांतर अनिष्टकारी हो जाता है। क्षणिक सुख के लिए जीवन से कर्तव्यविमुख होना यह सज्जन का कार्य नहीं है। तुच्छ सुखों से कभी तृप्ति नहीं होती और अभिलाषा बढ़ती ही जाती है।
कहा है कि
धनेषु जीवितव्येषु चाहारकर्मसु ।
अतृप्ताः प्राणिनः सर्वे याता यास्यन्ति यान्तिच । ।
अर्थात् धन, जीवन, स्त्री, आहार कर्म में प्राणी अतृप्त हो जाता है, हो
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