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________________ श्रमण/अप्रैल-जून/१९९६ : १३ रावण का वध, रावण का दाह संस्कार, विभीषण का राज्याभिषेक तथा राम, सीता, लक्ष्मण का अयोध्या लौट आना, प्रजाजनों द्वारा राम का राज्याभिषेक, राम द्वारा अर्धभारत क्षेत्र को विजयी बनाना आदि प्रसंग वर्णित हैं। थोड़ी बहुत फेरबदल के साथ जैन रामायण कथा पौराणिक रामायण कथा से बहुत मिलती है। यहाँ रावण को रामण नाम विद्याधर राजा बताया गया है। सीता उसी की पुत्री है। रावण का वध राम से नहीं वरन् लक्ष्मण से दिखाया गया है। शेष कथा में कोई विशेष अन्तर नहीं है। रामायण में जैसे सीता मृगशावक को देखकर उसको लेने के लिये मचल जाती है, उसी प्रकार वसदेवहिंडी में नीलयशा मयुर शावक को देखकर उसे लेने के लिये हठ करती है। वसुदेव मयूर शावक को लेने जाता है और लेने जाने में सीता की तरह नीलयशा का अपहरण हो जाता है। जिस प्रकार विरहाग्नि से तप्त रावण की अशोक वाटिका में शृंगार रहित सीता तपस्विनी की तरह रहती है उसी प्रकार सोमश्री मानसवेग के प्रमदवन में विद्याधरी कन्याओं के बीच तपस्विनी की तरह रहती है। यहाँ हनुमान के स्थान पर वह सोमश्री प्रभावती को वसुदेव के पास सन्देश देकर भेजती है। अन्य स्थान पर ज्योतिर्वन में रत्नों से चित्रित मृग की ओर रानी सुतारा का आकृष्ट होना, उसको लेने के लिए आग्रह करना, राजा द्वारा मृग का पीछा करना, मायावी मृग का उड़ जाना, रानी का अपहरण हो जाना, अपहरणकर्ता के पास रानी को छुड़ाने के लिये दूत भेजना, इंकार हो जाने पर युद्ध करना आदि रामायण के सीताहरण से काफी साम्य रखता है। राजा सगर के ६० हजार पुत्रों द्वारा अष्टापद पर बने जिनायतन की रक्षा के लिये उसके चारों ओर खाई खोदना, नागलोक में पानी चला जाना, क्रोधित नाग का सगर पुत्रों को भस्म कर देना, भगीरथ प्रपौत्र का नागदेवता की पूजार्चना करके गंगा का मार्ग समुद्रगामी बना देना, पौराणिक कथा के अनुसार सगर पुत्रों का गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिये रास्ता बनाने के लिये खाई खोदना, नाग का क्रोधित होकर सगर पुत्रों को भस्म कर देना तथा शिव को भक्ति-पूजा से प्रसन्न करके भगीरथ का गंगा को पृथ्वी पर लाना आदि वर्णित है। भगीरथ द्वारा गंगा के पृथ्वी पर अवतरण के प्रसंग में आचार्य ने जैन परम्परा का पुट देकर शिव को प्रसन्न करने के स्थान पर नाग को प्रसन्न किया है। गंगा को स्वर्ग से न उतार कर उसका रुख बदल दिया है और न ही मृत आत्माओं की शान्ति के लिये प्रेतकर्म किया है। महाभारत में जैसे पाण्डु को शाप मिला था कि अगर वह स्त्री से समागम करेगा तो उसकी मृत्यु हो जायेगी, उसी प्रकार वसुदेवहिंडी में उद्यान के फल-फूल नष्ट हो जाने पर क्रोधित चण्ड कौशिक द्वारा राजा को शाप दिया गया कि मैथुन सम्प्राप्ति के समय राजा के मस्तिष्क के १०० टुकड़े हो जायेंगे। तापसी का सभामण्डप में प्रवेश करना, राजा को औरस पुत्र को स्वीकार करने के लिये कहना, राजा को कुछ याद न आना, तापसी को झूठी कहना, स्वाभिमानिनी तापसी का पुत्र को वहीं छोड़कर चला जाना, Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.525026
Book TitleSramana 1996 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAshok Kumar Singh
PublisherParshvanath Vidhyashram Varanasi
Publication Year1996
Total Pages130
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Sramana, & India
File Size6 MB
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