SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 65
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ प्राकृत जैनागम परम्परा में गृहस्थाचार ६३ कार्य प्रमादाचरित अनर्थदण्ड हैं और इनसे निवृत्त रहना प्रमादाचरित अनर्थदण्ड विरमणव्रत कहलाता है। हिंसादिक तथा रागादिक को बढ़ाने वाली दुष्ट कथाओं का नहीं सुनना और न दूसरों को सुनाना दुःश्रुति अनर्थदण्ड विरमणव्रत कहा जाता है।' ___अनर्थदण्डव्रत के निम्न पांच अतिचार बताए गये हैं-- कन्दर्प, कौत्कुच्य, मौखर्य, असमीक्ष्याधिकरण और भोगपरिभोगानर्थक्य । हास्ययुक्त, अशिष्ट और विकारवर्धक वचन बोलना या सुनना कन्दर्प कहलाता है। शरीर द्वारा विकारवर्धक चेष्टा सहित वचन प्रयोग कौत्कुच्य है। असम्बद्ध और अनावश्यक बोलना मौखर्य कहलाता है। प्रयोजन के बिना कोई-कोई क्रिया करते रहना, या उसका चिन्तन करना, असमीक्ष्याधिकरण कहा जाता है। इसे संयुक्ताधिकरण भी कहा गया है। आवश्यकता न होने पर भी उपभोग परिभोग की सामग्री को एकत्रित करना और उसका अधिक संग्रह करके रखना भोगपरिभोग अनर्थक्य है, ये पाँच इस व्रत पालन में बाधक दोष हैं, इसलिए श्रावक को इनका जानना आवश्यक है. जिससे व्रतों का निर्दोष पालन हो सके। इसप्रकार अनर्थदण्डविरमणव्रत के द्वारा साधक मुख्यतः अहिंसाणुव्रत का पोषण करता है। दूसरे शब्दों में, अनर्थदण्ड. विरमणव्रत का उद्देश्य अहिंसा का सूक्ष्म पालन कराना है । २ सामायिकव्रत __ सम् का अर्थ समता या समभाव है और आय का अर्थ लाभ या प्राप्ति है । इस तरह समाय का अर्थ होता है- समभाव का लाभ या समता की प्राप्ति । इस समाय विषयक क्रिया या भाव सामायिक कहलाता है। सामायिक आत्मा का भाव है अथवा शरीर की एक क्रिया विशेष है, जिससे मनुष्य को समभाव की प्राप्ति होती है। सामायिक का आराधक त्रस और स्थावर समस्त जीवों के प्रति समभाव रखता है । श्रमण भी सामायिक का आराधक होता है। श्रमण और श्रावक १. र० क० श्रा० ७६-८०; स० सि० ८।२१; पु० सि० उ० १४२-४५ २. कन्दर्प कौत्कुच्चमौखर्यासमीक्ष्याधिकरणोपभोगपरिभोगानर्थक्यानि । ___ त० सू० ७१३२, उवासग० १।३९, र० क० श्रा० ८१ ३. सर्वसावध निवृत्तिलक्षणसामायिकम् । स० सि० ७।१, Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.525010
Book TitleSramana 1992 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAshok Kumar Singh
PublisherParshvanath Vidhyashram Varanasi
Publication Year1992
Total Pages88
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Sramana, & India
File Size5 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy