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________________ ९६ श्रमण, जनवरी-मार्च १९९२ वाक्य को सापेक्ष एवं सीमित करता है (२) वस्तुओं के अनन्तधर्मो को व्यक्त करता है । (३) सर्वथा एकांतता का विरोध करता है, चाहे वह किसी वाक्य या भाषा में हो या वस्तु का स्वरूप हो आदि । शून्यवाद परिचय - शून्यवाद तत्त्व विषयक सिद्धांत है । यहाँ 'शून्य' शब्द सामान्य प्रचलित अर्थ 'अभाव' से भिन्न अर्थ में प्रयुक्त हुआ है । शून्य का तात्पर्य है चतुष्कोटि (सत्, असत् सत्-असत् उभय, सत्-असत् अनुभय) विनिर्मुक्त अर्थात् अनिर्वचनीय । इसमें परमतत्त्व एवं भौतिक तत्त्व दोनों शून्य हैं । शून्यवाद के प्रणेता नागार्जुन के मत में परमतत्त्व का पूर्ण ज्ञान हमारी बुद्धि से परे है । अतः परमतत्त्व के विषय में कोई भी कथन अपूर्ण होगा एवं विकारयुक्त होगा । भौतिक तत्त्व भी शून्य कहे गये हैं क्योंकि बुद्धि द्वारा वस्तुओं का स्वभाव ज्ञात कर पाना दुष्कर है । कारण यह कि वस्तुएँ सतत उत्पन्न होती रहती हैं, सर्वदा परिवर्तन शील हैं, एक जैसी नहीं रहती हैं। वस्तुतः वस्तुएं चतुष्कोटि -- सत्, असत्, सत्-असत् उभय, सत्-असत् अनुभय विनिर्मुक्त हैं) । नागार्जुन ने प्रतीत्य समुत्पाद को ही शून्यता कहा - "यः प्रतीत्यसमुत्पादः शून्यतां तां प्रचक्ष्महे"" इन्होंने प्रतीत्यसमुत्पाद के माध्यम से वस्तुविषयक अनिर्वचनीयता का प्रतिपादन किया है। इस सिद्धांत के अनुसार वस्तुएं परस्पर एक दूसरे पर निर्भर हैं । वस्तुओं के सभी धर्म अपनी उत्पत्ति के लिए अन्य पर आश्रित है - अतः जितने धर्म हैं सभी शून्य हैं । इस विचार से यह स्पष्ट है कि वस्तुओं के परावलम्बन को, उसकी निरन्तर परिवर्तनशीलता को, उसकी अवर्णनीयता को ही "शून्य" की संज्ञा दी गई है ( मध्यमक शास्त्र अध्याय २४, कारिका १८, १९) नि:स्वभावता ही वस्तु का पारमार्थिक स्वभाव है जैसा कि बोधिचर्यावतार में कहा गया है - एवं निःस्वभावतैव सर्वभावानां निजं पारमार्थिकं रूपमवष्ठितं । शून्यवाद में सभी एकांतिक मतों से परे मध्यम मार्ग को ही अपनाया गया है । इस विचार धारा में तत्त्व को दोनों अतियों (सत् एवं असत्) से मुक्त रखा गया है । शून्यवाद अभाववाद नहीं है । इसकी प्रतिपत्ति भावात्मक नहीं किन्तु निषेधात्मक है, ( उपनिषद् के नेति नेति १. माध्यमिक कारिका २४|१८: Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.525009
Book TitleSramana 1992 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAshok Kumar Singh
PublisherParshvanath Vidhyashram Varanasi
Publication Year1992
Total Pages128
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Sramana, & India
File Size6 MB
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