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________________ जैन श्रमण साधना : एक परिचय डा० सुभाष कोठारी "साधना" को जैन दर्शन में मोक्ष मार्ग कहा है, जैनेतर दर्शन में "योग" व जन साधारण की भाषा में सदा "आचरण" कहा जाता है । यहाँ साधना का सामान्य अर्थ "इन्द्रिय-निग्रह' है, ' अर्थात् मन, वचन व काया पर पूर्ण संयम रखना । ५ जैन - साधना का इस दृष्टि से विशेष महत्त्व हो जाता है क्योंकि वह साधना करने वाले के पुरुषार्थ और बल पर ही आत्म-सिद्धि को निर्भर मानती है । चिरशान्ति की प्राप्ति के लिए एक मात्र साधन, साधना ही है और इसी से मुक्ति की प्राप्ति हो सकती है । ज्यों-ज्यों साधक साधना की उत्तरोत्तर गहनता में उतरता है, त्यों-त्यों उसके मोह का बंधन टूटता जाता है एवं वह मुक्ति की ओर अग्रसर होता चला जाता है । साधना का वर्गीकरण : जैन साधना में धर्म के दो रूप माने गये हैं- एक श्रुतधर्म और दूसरा चारित्रधर्म । श्रुतधर्म का अर्थ है - जीव, अजीव, पुण्य, पाप, आश्रव, संवर, निर्जरा, बन्ध और मोक्ष - इन नव तत्त्वों का सम्यक ज्ञान और श्रद्धा होना । चारित्रधर्म का अर्थ संयम एवं तप है। साधु व श्रावक के आचार के अन्तर का आधार केवल चारित्र ही है । श्रमण की साधना उत्कृष्ट एवं कठोर होती है परन्तु श्रावक की साधना उतनी उत्कृष्ट व कठोर नहीं होती है । श्रमण तो सांसारिक प्रपंचों से अलग-थलग रहकर आरम्भ, परिग्रह से मुक्त होकर साधना करता है, परन्तु श्रावक घर के प्रपंचमय जीवन में रहकर ही साधना करता है । १. पटेरिया, एम० पी०, जैन साधना पद्धति : एक विश्लेषण - श्री अम्बागुरु अभिनन्दन ग्रन्थ, पृ० : ३३९ २. जैन, डॉ० सागरमल - जैन, बौद्ध और गीता के आचार दर्शनों का तुलनात्मक अध्ययन, पृ० : २५७ प्राकृत भारती अकादमी, जयपुर । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.525005
Book TitleSramana 1991 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAshok Kumar Singh
PublisherParshvanath Vidhyashram Varanasi
Publication Year1991
Total Pages112
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Sramana, & India
File Size5 MB
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