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अनुष्ठानों का उद्देश्य भी लौकिक उपलब्धियों एवं विघ्न-बाधाओं का उपशमन न होकर व्यक्ति का अपना आध्यात्मिक विकास ही है । जैन साधक स्पष्ट रूप से इस बात को दृष्टि में रखता है कि प्रभु की पूजा और स्तुति केवल भक्त के स्वस्वरूप या जिनगुणों की उपलब्धि के लिए है । आचार्य समन्तभद्र स्पष्ट रूप से कहते हैं कि हे नाथ! चूंकि आप वीतराग हैं, अतः आप अपनी पूजा या स्तुति से प्रसन्न होने वाले नहीं हैं और आप विवान्तवेर हैं इसलिए निन्दा करने पर भी आप अप्रसन्न होनेवाले नहीं हैं । आपकी स्तुति का उद्देश्य केवल अपने चित्तमल को दूर करना है
न पूजयाऽर्थस्त्वयि वीतरागे, न निन्दया नाथ ! विवान्तवैरे । तथापि ते पुण्यगुणस्मृतिर्नः, पुनातिचित्तं दुरिताऽजनेभ्यः ॥ इसी प्रकार एक गुजराती जैन कवि कहता है
अजकुलगतकेशरि लहेरे निजपद सिंह निहाल । तिम प्रभुभक्ति भवि लहेरे निज आतम संभार ॥
जैन परम्परा का उद्घोष है - 'वन्दे तद्गुण लब्धये' किन्तु जिनदेव की एवं हमारी आत्मा तत्त्वतः समान है अतः वीतराग के गुणों की उपलब्धि का अर्थ है स्वस्वरूप की उपलब्धि । इस प्रकार जैन अनुष्ठान मूलतः आत्मविशुद्धि और स्वस्वरूप की उपलब्धि के लिए है । जैन अनुष्ठानों में जिन गाथाओं या मन्त्रों का पाठ किया जाता है उनमें भी अधिकांशतः तो पूजनीय के स्वरूप का ही बोध कराते हैं अथवा आत्मा के लिए पतनकारी प्रवृत्तियों का अनुस्मरण कर उनसे मुक्त होने की प्रेरणा देते हैं । जिनपूजा के विविध प्रकारों में जिन पाठों का पठन किया जाता है या जो गीत आदि प्रस्तुत किये जाते हैं उनका मुख्य उद्देश्य आत्मविशुद्धि ही है । इस अर्थ में वैदिक परम्परा में प्रचलित अनुष्ठानों से जैन परम्परा के अनुष्ठान भिन्न हैं, वैदिक अनुष्ठानों का लक्ष्य मनुष्य जीवन की विघ्न-बाधाओं का उपशमन कर उसका ऐहिक हित साधन करना है ।
यद्यपि जैन अनुष्ठानों की मूल प्रकृति अध्यात्मपरक है किन्तु मनुष्य की यह एक स्वाभाविक कमजोरी है कि वह धर्म के माध्यम से भौतिक सुख-सुविधाओं की उपलब्धि तथा उनकी उपलब्धि में
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