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'जड़ और चेतन का समवाय संसार है। संसरणशीलता संसार का मूल स्वभाव है। इस स्वभाव को कर्म सक्रिय रखते हैं। दर्शनावरणीय, ज्ञानावरणीय, मोहनीय, अन्तराय, आयु, नाम, गोत्र और वेदनीय नामक वसु कर्मों में संसार के अन्य सभी कर्मकुल अन्तर्भुक्त हो जाते हैं। जीव इन्हीं कर्मों के कारण सांसारिक चक्रमण में अनादिकाल से सक्रिय है । जन्म-मरण के दारुण दुःखों को भोग रहा है।"
"जीव और उसकी पर्याय- शरीर का सम्बन्ध कृत नहीं प्राकृत है और इसलिए वह कहलाता है - प्रकृति । प्रकृति को शील और स्वभाव से भी अभिहित किया जाता है। जिस प्रकार सोने में मल का अनादिकालीन सम्बन्ध है उसी प्रकार जीव और शरीर का सम्बन्ध भी अनादि है, इस सम्बन्ध का कोई कर्त्ता नहीं है।"
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'कर्म - -जाल में फँसकर प्राणी उससे निकलने का बार-बार प्रयास करता है पर इससे निकल पाना इतना सरल और सुगम नहीं है। इससे निकलने का एकमात्र उपाय कर्म-जाल काटना ही है । "
"प्राणी जो अनादिकाल से वसु कर्मों के बंध में बँधता चला आ रहा है उसके निवारणार्थ उसे चारित्र-साधना करने के लिए तदनुसार चर्या करना परम आवश्यक होता है। सारांश में कहा जा सकता है कि मिथ्यात्व कर्म-बंध का मुख्य कारण है और निवारण का मुख्य आधार है। सम्यक्त्व । "
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अभी तक यह धारणा चली आ रही थी कि 'द्रव्यसंग्रह' या 'बृहद्द्रव्यसंग्रह' के रचयिता 'नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती' हैं पर अब नये प्रमाणों के आलोक में यह मान्यता परिवर्तित हो गई है। समीक्षक विद्वानों का अभिमत है कि द्रव्यसंग्रह के रचयिता 'नेमिचन्द्र सिद्धान्तिदेव' या 'नेमिचन्द्र मुनि' हैं ।
बृहद्रव्यसंग्रह के टीकाकार ब्रह्मदेव ने ग्रन्थ का परिचय देते हुए लिखा है कि मालवदेश धारा नगरी का स्वामी कलिकाल सर्वज्ञ भोजदेव था । उससे सम्बद्ध मण्डलेश्वर श्रीपाल के आश्रम नामक नगर में श्री मुनिसुव्रत तीर्थंकर के चैत्यालय में भाण्डागार सोमनामक राज श्रेष्ठ के लिए श्री नेमिचन्द्र सिद्धान्तिदेव ने 'द्रव्यसंग्रह' नामक ग्रन्थ रचा।
"नेमिचन्द्राचार्य द्वारा चुनी एवं रची गई सामग्री सीधी गणितीय थी, विश्वरचना सम्बन्धी तथा सूक्ष्मतम जगत् के रहस्यों से भरी वैज्ञानिक नियंत्रण प्रणाली रूप विलक्षण थी । अतः वह अपने आप में भारतीय अन्य मतों से अथवा विश्व के अन्य मतों से विलग विशालरूप में पनपती चुनौतीरूप में उतर आयी ।"
जैनविद्या का यह अंक 'नेमिचन्द्र विशेषांक' के रूप में प्रकाशित है। जिन विद्वान् लेखकों ने अपनी रचनाएँ भेजकर इस अंक के प्रकाशन में सहयोग प्रदान किया उन सभी के प्रति हम आभारी हैं।
संस्थान समिति, सहयोगी सम्पादक, सम्पादक मण्डल एवं सहयोगी कार्यकर्ताओं के प्रति आभारी हैं। मुद्रण हेतु जयपुर प्रिन्टर्स प्रा. लि. धन्यवादाह है।
डॉ. कमलचन्द सोगाणी