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________________ चामुण्डराय का घरेलू नाम गोम्मटराय था, इनके निमित्त रचना करने के कारण इस ग्रन्थ का नाम 'गोम्मट-संग्रह' 'गोम्मट-संग्रह-सूत्र' 'गोम्मट-सूत्र' अर्थात् गोम्मटराय के निमित्त बनाया गया संग्रह सूत्र दिया है।" ___" 'गोम्मटसार' ग्रन्थ अनेक दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण है। जीव तत्त्व एवं कर्म-सम्बन्धी विवेचना उसका मुख्य प्रतिपाद्य है । जीवकाण्ड में जीव से सम्बद्ध अनेक प्रकरणों का वर्णन है। इसमें जीवों के भेद-प्रभेद बतलाते हुए उनके एक से दस तक चौदह, उन्नीस, सत्तावन और अट्ठानवे भेद कहे गये हैं। इन्हें वे जीव-समास कहते हैं।" ___ "लेश्या सम्बन्धी विस्तृत वर्णन गोम्मटसार के जीवकाण्ड में किया गया है जो जैनधर्म के मौलिक चिन्तन की ओर संकेत करता है।" "कर्मकाण्ड में कर्मों की निर्जरा एवं तत्त्वों के स्वरूप के अवधारण-निश्चय का वर्णन है। कर्मकाण्ड में संसार दुःखदायक या सुखप्रतिबंधक कर्म सिद्धान्त का सूक्ष्म विवेचन किया " 'गोम्मट' शब्द मराठी में एक विशेषण है और उसका अर्थ है - साफ, सुन्दर, आकर्षक अच्छा आदि। कोंकणी भाषा में 'गोम्टो' शब्द है और उसका वही अर्थ है जो मराठी में है। 'गोम्मट' शब्द का अर्थ है - उत्तम आदि। कन्नड़ भाषा में भी 'गोम्मट' शब्द उत्तम के अर्थ में तथा विशेषण एवं नाम के अर्थ में व्यवहृत हुआ है।" __"आचार्य नेमिचन्द्र की त्रिलोकसार जैन-दर्शन के लोकानुयोग साहित्य से सम्बन्धित है जिसमें भूगोल-खगोल, ज्योतिष-निमित्त एवं ग्रह-गणित आदि का विस्तृत विवरण दिया है। नाम के अनुरूप इस ग्रन्थ में तीन लोक अर्थात् ऊर्ध्वलोक, मध्यलोक और अधोलोक का वर्णन किया है।" . "ग्रह, नक्षत्र, प्रकीर्णक, तारा-सूर्य-चन्द्र की आयु, विमान, गति, परिवार आदि का भी सांगोपांग वर्णन पाया जाता है । त्रिलोक की रचना के सम्बन्ध में सभी प्रकार की जानकारी इस ग्रन्थ से प्राप्त की जा सकती है।" __ "त्रिलोकसार में लोक की सीमाएँ, उसके ज्यामितीय खण्ड, चारों ओर से वेष्टित पदार्थ, भौगोलिक, ज्योतिष आदि के विवरण भी गणित द्वारा दिये गये हैं । ऋतु, राहू, कर्क, मकर राशियाँ, मध्यप्रदेश, धाराएँ, शलाका गणन के सभी सिद्धान्त आदि नवीन विवरण हैं।" "अध्यात्म शक्ति से अर्जित ज्ञान को त्रिलोकसार में समाविष्ट किया गया है।" "लब्धिसार आचार्य नेमिचन्द्र की अन्य कृति है जो गोम्मटसार का उत्तर भाग समझना चाहिए। लब्धिसार में जीव के कर्म-बन्ध, कर्मों से छूटने की प्रक्रिया अर्थात् लब्धिरूप सम्यग्दर्शन और सम्यक्चारित्र की उपलब्धि की प्रक्रिया सविस्तार दर्शायी है।" __ "छह सौ तिरेपन गाथाओं वाले 'क्षपणासार' में कर्मों को क्षय करने की विधि का निरूपण किया गया है।" __ "जिनागम में गणित की प्रतिष्ठा कराने का सर्वाधिक श्रेय आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती को जाना चाहिये। उन्होंने आगे आनेवाली पीढ़ियों के लिए जैनधर्म के सारभूत पूर्वो के कर्मसिद्धान्त विषयक जटिलतम ज्ञानांश को गणितीय सूत्रबद्ध रचनाओं में पिरो दिया।"
SR No.524766
Book TitleJain Vidya 19
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamalchand Sogani & Others
PublisherJain Vidya Samsthan
Publication Year1997
Total Pages78
LanguageSanskrit, Prakrit, Hindi
ClassificationMagazine, India_Jain Vidya, & India
File Size6 MB
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