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जैनविद्या-12
ग्रहण होने पर भौ नोकर्मरूप पुद्गलों का ग्रहण नहीं होता वह विग्रह है और इस विग्रह के साथ होने वाली गति विग्रहगति है । (2.25)
सर्वशरीरप्ररोहणबीजभूतं कार्मणं शरीरं कर्मेत्युच्यते-सब शरीरों की उत्पत्ति के मूल कारण कार्मण शरीर को कर्म कहते हैं । (2.25) योग
योगो वाङ मनसकायवर्गणानिमित्त आत्मप्रदेशपरिस्पन्दः--वचन वर्गणा, मनोवर्गणा और कायवर्गणा के निमित्त से होनेवाले आत्मप्रदेशों के हलनचलन को योग कहते हैं (2.25) कर्मयोग
कर्मणाकृतो योगः कर्मयोगः-कर्म के निमित्त से जो योग होता है वह कर्मयोग है । (2.25) श्रेणि
लोकमध्यादारभ्य उर्ध्वमधस्तिर्यक् च आकाशप्रदेशानां क्रमसंनिविष्टानां पंक्तिः श्रेणिः इत्युच्यते-लोक के मध्य से लेकर ऊपर नीचे और तिरछे क्रम से स्थित आकाशप्रदेशों की पंक्ति को श्रेणी कहते हैं । (2.26) आहार
त्रयाणां शरीराणां षण्णां पर्याप्तीनां योग्यपुद्गलग्रहणमाहारः-तीन शरीर और छह पर्याप्तियों के योग्य पुद्गलों के ग्रहण करने को आहार करते हैं । (2.26) संमूर्छन
त्रिषु लोकेषूर्ध्वमधस्तिर्यक् च देहस्य समन्ततो मूर्छन संमूर्छनमवयवप्रकल्पत्रयम्-तीनों लोको में ऊपर, नीचे और तिरछे देह का चारों ओर से मूर्छन अर्थात् ग्रहण होना संमूर्छन है । (2.31) गर्भ
स्त्रिया उदरे शुक्रशोणितयोर्गरणं मिश्रणं गर्भः-स्त्री के उदर में शुक्र और शोणित के परस्पर गरण अर्थात् मिश्रण को गर्भ कहते हैं । (2.31) उपपाद
उपेत्य पद्यतेऽस्मिन्निति उपपादः-प्राप्त होकर जिसमें जीव हलन-चलन करता है उसे उपपाद कहते हैं । (2.31) सचित्त
आत्मनश्चैतन्यविशेषपरिणामश्चित्तम्, सह चित्तेन वर्तत इति सचित्तः-आत्मा के चैतन्यविशेष रूप परिणाम को चित्त कहते हैं, जो उसके साथ रहता है, वह सचित्त कहलाता है। (2.32)