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________________ जनविद्या 43 इसके उपरान्त रस का क्रम प्राता है । काव्यशास्त्र के अनुसार काव्य में रस का स्थान बड़े महत्त्व का है । शरीर में जो स्थान प्रात्मा का है वही काव्य में रस का है । काव्य की प्रात्मा रस कहलाती है। आस्वाद और द्रवत्व की दृष्टि से रस का रूप दो प्रकार का कहा गया है । जहाँ एक ओर 'रस्यते आसवाद्यते इति रसः' से रस के रूप को स्थिर किया जाता है वहाँ दूसरी ओर 'रसते इति रसः' के द्वारा शास्त्र में रस शब्द का प्रयोग काव्यास्वाद अथवा काव्यानंद के लिए होता है। .. तैत्तिरीय उपनिषद् में रस को ब्रह्मानन्द-सहोदर कहा है । आचार्य विश्वनाथ भी सत्त्वोद्रेक कह कर रस का हेतु निर्धारित करते हैं । यह चिन्मय है, स्वप्रकाश आनन्द है, अखण्ड है । विचार करें तो सहज ही प्रतीत हो जाता है कि नवरसों में निर्वेदजन्य शान्तरस ही ऐसा उत्कृष्ट रस है जिसके उद्रेक से अतीन्द्रिय अानन्द की अनुभूति हो उठती है । इस दृष्टि से विवेच्य काव्यकृतियों में शान्तरसधार प्रवाहित है । आकुल आदमी इसमें अवगाहन करते ही निष्ताप और निष्कलुष हो उठता है । यह जागतिक प्राणी की वह अवस्था है जब उसका सम्बन्ध राग-द्वेष से मुक्त सहज अवस्था की अनुभूति कर उठता है। राग आकुलता का कारण है और द्वेष है उत्पीड़न का। इस अवस्था में प्राणी आत्मिक अनुभूति करने में सर्वथा असमर्थ रहता है। कवि ने इन काव्यों में रसोद्रेक की दृष्टि से ऐन्द्रिक रसों की अपेक्षा प्राध्यात्मिक रस-शान्तरसधार को गृहीत किया है । जैन कवियों की रस विषयक अवधारणा निश्चय ही रसलोक में एक अभिनव दृष्टिकोण का प्रवर्तन करती है । काव्य में प्रकृति-प्रयोग एक अनिवार्य अनुष्ठान है । पालम्बन, उद्दीपन और आलंकारिक दृष्टि से काव्य में प्रकृति-प्रयोग तीन प्रकार से कहा जा सकता है । कवि को प्रकृतिप्रयोग करना इष्ट नहीं है। काव्याभिव्यक्ति में यदि उसे अपनी बात सुगम और प्रभावक बनाने के लिए प्रकृति-प्रयोग आवश्यक हुआ तो उसने अालंकारिक प्रयोग में प्रकृति-तत्त्वों को सहर्ष गृहीत किया है। - इस दृष्टि से कवि के काव्य का भावपक्ष प्रवृत्तिपरक नहीं है । वह मूलतः निवृत्तिपरक है और आध्यात्मिक उन्नयन जनसाधारण तक पहुंचाने के लिए काव्य की शरण लेता है । विवेच्य काव्य का यही कथ्य है और है यही तथ्य जिसमें कवि को पर्याप्त सफलता प्राप्त जिस प्रकार मंत्र की महिमा तंत्र पर निर्भर करती है उसी प्रकार काव्य के भावपक्ष की सफलता उसके कला-पक्ष पर निर्भर करती है । अभिव्यक्ति एक शक्ति है और कविमनीषी योगीन्दु शक्ति-सामन्त हैं। कला-पक्ष का प्रमुख उपकरण है भाषा। किसी भी काव्य की सफलता उसकी प्रयुक्त भाषा पर निर्भर करती है । विवेच्य कवि ने इन काव्यों में लोकाश्रित अपभ्रंश भाषा का उपयोगी चयन किया है तथा सफलतापूर्वक परीक्षण भी । प्राध्यात्मिक जटिल किन्तु नीरस विषय को सर्वसामान्य के लिए सरस तथा उपयोगी बनाने का पूरा श्रेय सटीक भाषा के व्यवहार पर निर्भर करता है । विवेच्य कवि ने हृदय को स्पर्श
SR No.524758
Book TitleJain Vidya 09
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPravinchandra Jain & Others
PublisherJain Vidya Samsthan
Publication Year1988
Total Pages132
LanguageSanskrit, Prakrit, Hindi
ClassificationMagazine, India_Jain Vidya, & India
File Size12 MB
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