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________________ जनविद्या समक्ष प्रस्तुत कर उनमें वैराग्य उत्पन्न करता है जिसे देखकर वे कह उठते हैं-'धिक, धिक्, यह मर्त्यलोक बड़ा असुहावना है, शरीर का भोग ही मानव के दुःख का कारण है, यहां समुद्र के तुल्य महान् दुःख हैं तथा भोगने का सुख मधुबिन्दु के समान अत्यल्प । हाय, जहाँ मानव दुःख से दग्धशरीर होकर बुरी तरह कराहता हुमा मरता है ऐसे संसार में निर्लज्ज व विषयासक्त मनुष्य को छोड़, कहो और कौन प्रीति कर सकता है ।2 करकण्डु की यह वैराग्य भावना उसे संसार का यह असुहावना रूप ही नहीं दर्शाती अपितु उसकी अनित्यता और चंचलता की ओर भी इंगित करती है। अन्त में करकण्डु इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं 'जो वैराग्य भाव को प्राप्त होकर इस अनित्य अनुप्रेक्षा का ध्यान करता है, वह नर सुललित और मनोहर गात्र होकर देवों के विमान को सुशोभित करता है।' जैनधर्म के अनुसार वैराग्य भावना की पुष्टि के लिए बारह अनुप्रेक्षात्रों से गुजरना पड़ता है-अनित्य (9.5-6), प्रशरण (9.7), संसरण (9.8), एकत्व (9.9), अन्यत्व (9.10), अशुचित्व (9.11), प्रास्रव (9.12), संवर (9.13), निर्जरा (9.14), लोक (9.15), बोधिदुर्लभत्व (9.16) और धर्मानुप्रेक्षा (9.17)। करकण्डचरिउ में नवीं सन्धि के पांचवे खण्ड से लेकर सत्रहवें खण्ड तक इसके रचनाकार श्रीकनकामर ने इन बारह अनुप्रेक्षाओं के बीच से नरेश्वर करकण्डु को चलने दिया है । सबसे पहले उनमें संसार की वस्तुओं के प्रति अनित्य भावना प्रकट होती है अर्थात् धर्म को छोड़कर वे संसार की अशेष वस्तुओं को अनित्य मानने की स्थिति में आ जाते हैं। उनकी चेतना में यह सत्य प्रकट हो उठता है कि सत्य को छोड़कर जीव की और कोई दूसरी शरण नहीं है। उन्हें यह विश्वास हो जाता है कि जीव अपने कर्मों का एकमात्र उत्तरदायी होता है। वे यह अनुभव करते हैं कि आत्मा शरीर से भिन्न है । उन्हें यह विश्वास होने लगता है कि यह पंचभौतिक शरीर और शारीरिक वस्तुएँ अपवित्र हैं । उन्हें यह लगता है कि प्रास्रव अर्थात् कर्म-प्रवेश के कारण ही जीव में यह अशुचित्व आया है । वे इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि अपने भीतर संवर भाव का अर्थात् कर्म के प्रवेश के निरोध की भावना आवश्यक है और यह कि निर्जराभावना के बिना जीव में प्रविष्ट कर्म पुद्गलों को बाहर निकालना सम्भव नहीं है। यही क्यों, लोकभावना अर्थात् जीवात्मा, शरीर और जगत् सभी द्रव्य हैं । इनमें से जीव की मुक्ति के लिए शरीर और जगत् को उससे अलग करना आवश्यक है। नरेश्वर करकण्डु को यह भी लगता है कि जो विशेषता मुनि शीलगुप्त में आई है वह अत्यन्त दुर्लभ है अर्थात् सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चारित्र दुर्लभ हैं तथा सबसे अन्त में धर्म-मार्ग में स्थिरता और उसके अनुष्ठानों के प्रति सावधानी आवश्यक है । इस प्रकार इन अनुप्रेक्षात्रों का मन से स्मरण करता हुअा, विषयों से हटकर चलता हुआ नरेश्वर करकण्डु मुनि तक पहुंचता है, अपनी राजसभा से चलकर शीलगुप्त तक पहुंचने के बीच में रचनाकार ने इन सम्पूर्ण अनुप्रेक्षाओं को करकण्डु के मन और मस्तिष्क में इस प्रकार गुजार दी हैं कि पाठक को यह नहीं लगता कि करकण्डु ने इतने थोड़े समय में इतनी सारी मानसिक क्रियाओं को कैसे सम्पादित किया। शीलगुप्त मुनि के सामने पहुँचते-पहुंचते करकण्डु की उस समय की स्थिति का वर्णन करते हुए कनकामर कहते हैं 'इन अनुप्रेक्षाओं को मन में स्मरण करता हुअा, स्वयं को विषयों
SR No.524757
Book TitleJain Vidya 08
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPravinchandra Jain & Others
PublisherJain Vidya Samsthan
Publication Year1988
Total Pages112
LanguageSanskrit, Prakrit, Hindi
ClassificationMagazine, India_Jain Vidya, & India
File Size11 MB
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