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________________ जनविद्या पितामह का नाम संघपति, पिता का नाम हरिसिंह, मां का नाम विजयश्री और पत्नी का नाम सावित्री था । कवि ने अपने गुरु के रुप में विभिन्न कृतियों में गुणकीति, यशकीति, श्रीपाल, कमलकीति, शुभचन्द्र एवं भट्टारक कुमारसेन का उल्लेख किया है। इन्ही की प्रेरणा से कवि ने विभिन्न कृतियों का प्रणयन किया । अपभ्रंश साहित्य के अधिकारी विद्वान् डा. राजाराम जैन ने अन्तः बाह्य परीक्षण के आधार पर रइधू का काल वि. सं. 1457-1536 (1400 ई.1479 ई.) निर्धारित किया है ।25 उन्होंने अद्यावधि महाकवि रइधू के जिन उपलब्ध-अनुपलब्ध 37 ग्रन्थों का अन्वेषण किया है उनमें सुदंसणचरिउ भी एक है। यह रचना अनुपलब्ध है। 10. सुदर्शनचरित वीरदास का दूसरा नाम पासकीर्ति भी मिलता है । सम्भवतः वीरदास त्यागी होने के बाद पासकीर्ति (पार्श्वकीति) नाम से प्रसिद्ध हुए । ये बलात्कारगण की कारंजा शाखा के भट्टारक धर्मचन्द्र द्वितीय के शिष्य थे । इन्होंने सुदर्शनचरित की रचना सं. 1549 (1627 ई.) में की थी । यह कृति मराठी भाषा की है। प्रस्तुत रचना में शीलव्रत और पंचनमस्कार मन्त्र का प्रभाव दिखाने के लिए सेठ सुदर्शन की कथा का अंकन किया गया है ।26 ___मराठी भाषा में ही मेघराज के गुरुबन्धु कामराज ने सुदर्शनपुराण की रचना की थी। इनका समय भी लगभग 17 वीं शताब्दी है । अन्यत्र भी आनुषंगिक रूप से सुदर्शनचरित का विवेचन हुआ है। सुदर्शनचरित विषयक स्वतन्त्र एवं मानुषंगिक साहित्य के इस विवेचन से अनायास ही हम इस निष्कर्ष को प्राप्त कर सकते हैं कि भारतीय भाषाओं के विकास में जैन कवियों ने भी महत्त्वपूर्ण योगदान किया है तथा एक समृद्ध एवं ऐश्वर्यशाली साहित्यिक परम्परा का निर्माण किया है । निःसंशय सुदर्शनचरित विषयक साहित्य के अध्ययन से भारतीय भाषाओं के साहित्य का भण्डार और अधिक समृद्ध होगा । 1. हरिषेण, बृहत्कथाकोश, प्रशस्तिपद्य 3-5 । सिंघी जैन ग्रन्थमाला, बम्बई, 1943, सम्पादक-उपाध्ये, डॉ. ए. एन. । 2. वही, प्रशस्तिपद्य 11-13। 3. 'इति श्री जिननमस्कारसमन्वितसुभगगोपाल कथानकमिदम्' वही, 60वीं सुभगगोपालकथा की अन्तपुष्पिका। 4. 12.9, सुदंसणचरिउ, नयनन्दि, सम्पादक-जैन डॉ. हीरालाल, प्राकृत-जैनशास्त्र एवं अहिंसा शोध संस्थान, वैशाली, 1960 । 5. सुदंसणचरिउ की अन्त्यप्रशस्ति । -6. प्राकृत ग्रन्थमाला अहमदाबाद, 1969, सम्पादक-जन डॉ. हीरालाल । साल।
SR No.524756
Book TitleJain Vidya 07
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPravinchandra Jain & Others
PublisherJain Vidya Samsthan
Publication Year1987
Total Pages116
LanguageSanskrit, Prakrit, Hindi
ClassificationMagazine, India_Jain Vidya, & India
File Size12 MB
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