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________________ जैन विद्या 2. बिक्कमनिबकालानो छाहत्तरदससएसु बरिसाणं । माहम्मि सुद्धपक्खे. 112 11 बहुरायकज्ज.... ...........! बीरस्स चरियकरणे एक्को संवच्छरो लग्गो ।। 5 ।। प्रशस्ति से उद्धृत 3. का वि कंत संदेसइ कंत हो, चूडुल्लयहो हत्थि मणिकंस हो । कोडुन मण्णमि एक्कु जि भल्लउ, अरिकरिदंतघडिउ बलउल्लउ । अक्ख का वि कंत भत्तारहो, कयकिणियहो न सोह इह हारहो । प्राणहि तिक्खखग्गपहनिम्मल, सई हयकुंभिकुंभमुत्ताहल । बोल्खइ का विकण्ण गयखेवही अवसरु अज्जु सामिरिणछेय हो । होइ न होइ एण भडभीसें, पहुरिणमोयणु एक्कें सीसें । तो वरि हउं मि जामि इउ कारेवि, नररूवेण खग्गफरु धारेवि । जंप का विकत न सहिज्जहो, दिट्ठए परबले पढमु भिडिज्जपहो । 'घत्ता - बोल्लइ को वि भडु महु कंते धडु पेक्खिज्जहि ररणे सल्लंतउ | अगलियखग्गफरु करणिय करु रिउदंतिदंते भुल्लंतउ I 6.3 4. 10.2 5. 9.8, 10.8-10, 10.13.10-14 | 6.2.5 1 7.2.11 I 8. नीलकमलदलको मलिए सामलिए नवजोव्वणलीलाललिए पत्तलिए । रुवरिद्धिमहारिणिए हा मदं विणु मयणं नडिए मुद्धडिए । 2.15 2.14 9. दिवि दिवि चित कंत हे सुंदरि, बट्टइ का वि प्रबर जोव्वणसिरि । 10. घरे प्रासि ज संठियं तुम्ह दव्वे, मए दिण्णयं धम्मकज्जम्मि सव्वं । इमं सुन्दरं कारियं चेइगेहं " 11.2.17 1 2.19 12. गय परमविसायहो परिणइ रायहो पेक्खहु केण निवारियs । जहि श्रड्डुवियड्डे चम्महो खंडें माणुसु केम वियारियs । 13. निन्नासमि प्रायहो पावमइ I 14. धण्णो सि सवरण तिहुवणतिलउ जिणदंसणु पाविउ सुहनिलउ । तरुणत्तणे वि इंदियदवणु, दीसइ पई मुयवि णु कवणु । परिगलिए वयसि सव्वहो वि जइ विसयाहिलाससिहि उबसमइ । कच्चें पल्लट्ठइ को रयणु, पित्तलए हेमु विक्कइ कवणु । सग्गापवग्गसुहु परिहरइ, को रउरवि नरइ पईसरइ । को महिलई कारणे लेई दिसि, सज्झायहाणि को को कुणइ रिसि । 2.17 2.18 2.18 335 93
SR No.524755
Book TitleJain Vidya 05 06
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPravinchandra Jain & Others
PublisherJain Vidya Samsthan
Publication Year1987
Total Pages158
LanguageSanskrit, Prakrit, Hindi
ClassificationMagazine, India_Jain Vidya, & India
File Size14 MB
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