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________________ अशुचि अनुप्रेक्षा जंगमेण संचरइ अजंगमु, असुइसरोरे न काई मि चंगम्। मड्डवियड्डहड्डसंघडियउ, " सिरहिं निबद्धउ चम्में मढियउ । रुहिर- मास- वसपूयविटलटलु, ___मुत्तनिहाणु पुरीसहो पोट्टलु। थवियउ तो किमि कोडु पयट्टइ, ___ दड्ढ़ मसाण छारु पल्लट्टइ। मुंहबिबेण जेण ससि तोलहि, परिणइ तासु कवोले निहालहि । लोयरणेसु कहिं गयउ कडक्खण, कहिं दंग्हि दरहसिउ वियक्खणु। विप्फरियाहस्तु कहिं वट्टइ, कोमलबोल्लु काई न पयट्टइ । धूयविलेवणु बाहिरि थक्कइ, असुइगंधु को फेडिवि सक्कइ । अर्थ-जंगम (चेतन) के द्वारा अजंगम का संचरण होता है। इस अशुचि शरीर में कुछ भी अच्छा नहीं है । यह शरीर आढ़े-टेड़े हाड़ों से संघटित है, शिरामों से निबद्ध है और चमड़े मंडा हुआ है, रुधिर मांस और वसा की गठरी है, मूत्र का खजाना और मन की पोट है; यदि (मरने पर) इसे पड़ा रहने दिया जाय तो कृमि-कीट इसमें प्रविष्ट हो जाते हैं और श्मसान में जलाने पर राख हो जाता है । जिस मुख की चंद्रमा से तुलना की जाती है देखो, उसके कपोलों की क्या दशा हो गई है । नेत्रों का कटाक्ष और दांतों की विचक्षण मुस्कान कहां गई ? होठों की वह शोभा अब कहां है ? कोमल वचन अब क्यों नहीं निकलते ? धूप का विलेपन भी बाहिर ही रहता है फिर शरीर की इस अशुचि गंध को कौन समाप्त कर सकता है। जं. सा.च. 11.6.1-8
SR No.524755
Book TitleJain Vidya 05 06
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPravinchandra Jain & Others
PublisherJain Vidya Samsthan
Publication Year1987
Total Pages158
LanguageSanskrit, Prakrit, Hindi
ClassificationMagazine, India_Jain Vidya, & India
File Size14 MB
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