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________________ जैनविद्या 115 यह भव्य जीव व्रत, तप, संयम, शील आदि गुणों का पालन करता है तथा महाव्रत के भार को भी सहता है किन्तु एक परम कला (सहज समाधि) से अनभिज्ञ होने से संसार में बहुत समय तक भ्रमण करता है । अरे आनन्द को प्राप्त करनेवाले ! वह संसार में बहुत घूमता है ॥8॥ कोई केश का लुंचन करते हैं, कोई सिर पर जटाओं का भार धारण करते हैं किन्तु अपनी शुद्धात्मा का ध्यान नहीं करते। फिर, वे इस संसार से कैसे पार हो सकते हैं ? अरे आनन्द को प्राप्त करनेवाले ! वे संसार से कैसे पार हो सकते हैं ॥9॥ तीनों समय जो अपने स्वभाव से बाहर रहते हैं, केवल परीषह का भार सहन करते रहते हैं, वे दर्शन-ज्ञान से बाहर हैं। परभावों में रहनेवाले को कालरूपी यम मार डालेगा। अरे आनन्द को प्राप्त करनेवाले ! उसे कालरूपी यम मारेगा ॥10॥ जो मुनि एक पक्ष (पन्द्रह दिन) में, एक माह में बिना किसी आशा के निरासक्त होकर हथेली पर भोजन का ग्रास (आहार) लेते हैं, आत्मा का जो ध्यान करते हैं, ऐसे आत्मज्ञानी को यमपुर का वास नहीं मिलता अर्थात् वे अमर होते हैं। अरे आनन्द को प्राप्त करनेवाले ! आत्मज्ञानी को यमपुर का निवास नहीं मिलता ॥11॥ जो बाहर में मुनिलिंग धारण करके भ्रमरहित (निश्चित) तुष्ट हो जाता है और अपनी शुद्धात्मा का ध्यान नहीं करता है तो निश्चित ही वह शिवपुर नहीं जाता । अरे आनन्द को प्राप्त करनेवाले ! वह निश्चित ही शिवपुर को नहीं जाता ॥12॥ जो मनुष्य जिनेन्द्र भगवान् की पूजा करते हैं, गुरु की स्तुति करते हैं, जिनवाणी (शास्त्र) का सम्मान करते हैं किन्तु आत्मदेव का चिन्तवन नहीं करते वे यमपुर जाते हैं । अरे पानन्द को प्राप्त करनेवाले ! वे नरक-निगोद रूप यमपुर को जाते हैं ।।13॥ ' जो मनुष्य सिद्ध परमात्मा का ध्यान करते हैं वे ध्यान के बल से अष्ट कर्मों का क्षय कर देते हैं । उनके लिए मोक्ष-नगर निकट होता है । फिर कर्म उनको संसार का दुःख नहीं देते हैं । अरे आनन्द को प्राप्त करनेवाले ! कर्म ऐसे प्राणी को भव-दुःख, पीड़ा नहीं देते ॥14॥ मुनि भी यही कहते हैं कि संसार का कुछ करने-धरने में जिनेन्द्र भगवान् असमर्थ हैं । उनके शुद्ध करने से हमारी आत्मा शुद्ध नहीं होती। तीनों लोकों के लिए यही मार्ग कहा गया है कि जो जैसा पुरुषार्थ करते हैं वैसा ही उनका होनहार होता है । अरे आनन्द को प्राप्त करनेवाले ! वैसा ही उनका होनहार होता है ॥15॥ जिस प्रकार लकड़ी (काष्ठ) में अग्नि व्याप्त रहती है, पुष्पों में सुगन्ध रहती है, उसी प्रकार देह में जीव बसता है - इस बात को कोई विरला व्यक्ति ही समझता है । अरे आनन्द को प्राप्त करनेवाले ! कोई विरला व्यक्ति ही इस बात को समझता है ॥16॥
SR No.524752
Book TitleJain Vidya 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPravinchandra Jain & Others
PublisherJain Vidya Samsthan
Publication Year1985
Total Pages152
LanguageSanskrit, Prakrit, Hindi
ClassificationMagazine, India_Jain Vidya, & India
File Size14 MB
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