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________________ तत्त्व विकासशील हों उसमें शांत-सहवास की उपलब्धि संभव है। जीवन का सबसे बड़ा सुख शांति पूर्वक रहने में है। एक साथ रहकर तीए छक्के की तरह रहना जीवन की सबसे बड़ी विडम्बना है। जहां परिवार के सब लोग एक दूसरे के सुख-दुःख में हार्दिक भाव से अपनी भागीदारी रखते हैं वह परिवार सुख-शांति और विकास की अकल्पित ऊंचाइयों को छू सकता है। जहां ऐसा नहीं होता वहां विकास की सम्भावनाओं के दरवाजे बन्द हो जाते हैं। शांत सहवास पर चर्चा करने से पूर्व अशांत सहवास के कारण भी विमर्शनीय हैंनिरपेक्ष व्यवहार : उमास्वाति का महत्वपूर्ण सूत्र है- "परस्परोपग्रह जीवानाम्'' सभी प्राणी परस्पर एक दूसरे का उपकार करते हैं।' यह सूत्र अनेकान्त-दर्शन का संवाहक तथा शांत सहवास का महत्वपूर्ण सूत्र है। व्यक्ति का जीवन सापेक्षता व सहयोग के आधार पर चलता है। उसका विकास समन्वय, सौहार्द व सापेक्ष दृष्टिकोण पर निर्भर करता है। सामाजिक प्राणी का जीवन संबंधयुक्त होता है। संबंधों की भूमिका में एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है - सापेक्ष चिन्तन । बहुत से लोगों का चिन्तन निरपेक्ष होता है। उनके अनुसार उन्हें किसी के सहयोग की आवश्यकता नहीं और न ही वे दूसरों का सहयोग करने के लिए तत्पर रहते हैं। उनकी स्वार्थ चेतना केवल स्व तक ही सिमटी रहती है। उनका सिद्धान्त रहता है- मैं पिया, मेरा बैल पिया, अब चाहे कुआ ढ़ह पड़े। यह चिन्तन किसी भी परिवार, संस्था या संगठन में शान्त सहवास का कारण नहीं बनता । पूज्य गुरुदेवश्री तुलसी ने अपनी कृति 'पंचसूत्रम्' में सापेक्षता का उल्लेख करते हुए लिखा है - 'सापेक्षत्वविकासेन सहयोगोऽभिवर्धते। . सहयोगस्य भावोऽस्ति तत्र प्रीतिःपरा भवेत्॥' परस्परता के विकास से सहयोग का विकास होता है। जहां सहयोग होता है वहां पारस्परिक प्रेम सहज उदित होता है। पति पत्नि के साथ निरपेक्ष व्यवहार करता है तो पारिवारिक जीवन अस्वस्थ बन जाता है। पड़ौसी पड़ौसी के साथ कटु व्यवहार करता है तो कटुता बढ़ती है, शत्रुता पनपने लगती है, न्यायालय के द्वार खटखटाने की स्थिति तक बन जाती है। __ आज व्यक्ति स्व को जितना महत्त्व देता है पर को उतना ही नकारने लगता है। स्व को महत्त्व देना बुरा नहीं है, यदि इससे किसी दूसरे का हित खंडित न हो। जब दूसरों का हित खंडित होने लगता है तो अशांति का वातावरण उत्पन्न हो जाता है, समस्याएं पैदा होने लगती हैं और संघर्ष के ज्वालामुखी फूटने लगते हैं। एक परिवार में अनेक सदस्य होते हैं। सभी व्यक्ति अलग-अलग विचारों वाले, अलग-अलग रूचि-मान्यता-सिद्धान्त वाले होते हैं। किन्तु फिर भी सब एक दूसरे के पूरक हैं। एक दूसरे के बिना किसी का काम नहीं चलता, सबका परस्पर सहयोग व सामंजस्य सापेक्ष होता है। जिस प्रकार हमारे शरीर में अनेक प्रकार की ग्रंथियां होती हैं। सबके अलग-अलग कार्य, अलग-अलग भाव, अलग-अलग 84 - तुलसी प्रज्ञा अंक 113-114 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.524608
Book TitleTulsi Prajna 2001 07
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShanta Jain, Jagatram Bhattacharya
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year2001
Total Pages170
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Tulsi Prajna, & India
File Size8 MB
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