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________________ हार्मोन्स होते हैं । फिर भी सब एक दूसरे के पूरक हैं, परस्पर सहयोग हैं, सामंजस्य हैं। जब तक सामंजस्य पूर्वक ग्रंथितंत्र काम करता है तब तक शारीरिक स्थिति ठीक रहती है। सहयोग व सामंजस्य के अभाव में सारा तंत्र गड़बड़ा जाता है, असंतुलित हो जाता है। संतुलन का आधार है अनेकांतिक दृष्टिकोण । ठीक यही स्थिति हमारे जीवन की है। यदि व्यक्ति सामूहिक जीवन में एक दूसरे की आवश्यकताओं को नजरअंदाज करने लगता है तो ऐसी स्थिति में परस्पर टकराव उत्पन्न होने लगता है, अलगाव की दीवारें खिंच जाती हैं, धीरे-धीरे वैमनस्य, घृणा और प्रतिशोध की भावनाएं पनपने लगती हैं, सरस जीवन में विरसता का विष घुलने लगता है। इसके विपरीत यदि परिवार के सभी सदस्य एक दूसरे के दुःख सुख को समझें, एक दूसरे की अपेक्षाओं को ध्यान में रखें तथा एक दूसरे के लिए सहयोगी बनें तो पारिवारिक मधुबन जाता है, शांत सहवास की सुवास चारों ओर बिखरने लगती है । निरपेक्ष व्यवहार जहां बिखराव पैदा करता है वहीं अनेकांत का सापेक्ष व्यवहार बिखरी मणियों को सुन्दर माला का आकार प्रदान करता है। शांत सहवास के लिए जरूरी है समाज में सामूहिक चेतना का विकास और इसके लिए सबका सहयोग, सौहार्द, सहभागिता, संवेदनशीलता और एक दूसरे को समझने की गुणात्मकता का होना भी अपेक्षित है। सापेक्ष व्यवहार शांत, सरस और सुखी जीवन का मूलमंत्र है। सहिष्णुता का अभाव : व्यक्ति के जीवन का हर पहलू चाहे सामाजिकता से जुड़ा हो या आध्यात्मिकता से, सहिष्णुता का स्पर्श पाकर ही चमकता है। सहिष्णुता से ही जीवन को नया प्रकाश मिलता है। इस संसार में जो भी व्यक्ति महान् बने हैं उन्होंने अपने जीवन में बहुत कुछ सहा है । सहन करना जिसके जीवन का लक्ष्य नहीं वह कभी महान् नहीं बन पायेगा। जो सहना नहीं जानता वह संघर्ष को जन्म देता है। परिवार का शांत सहवास सहिष्णुता के कारण ही सुरक्षित रह सकता है। शांत-सहवास के लिए एक दूसरे के विचारों, व्यवहारों और तौर-तरीकों को सहना बहुत जरूरी है । सहना केवल छोटों के लिए ही जरूरी नहीं, बड़े लोगों के लिए तो वह कर्त्तव्य की कसौटी है। इस प्रसंग में गुरुदेव श्रीतुलसी ने 'पंचसूत्रम्' में लिखा है— - “कनिष्ठं कर्हिचिज्ज्येष्ठः कदाचित् तं कनिष्ठकः । सहेत सुधिया शान्त - सहवासस्य हेतवे ॥" शांत सहवास के लिए कभी छोटा बड़े को और बड़ा छोटे को सम्यक् प्रकार से सहन करें।' अनेकांत के दर्शन से ही एक दूसरे को सहन करना संभव है, क्योंकि सहना दीनता नहीं, व्यक्ति की उदारता है। सहन करने का मतलब है शक्ति का विकास, शौर्य और पराक्रम का विकास ।' व्यक्ति चाहे अकेला रहता हो या समूह में, सहना जीवन की अपरिहार्यता है । जो सहना जानता है, वह अपने जीवन के उतार-चढ़ाव में सम रह सकता है। अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियां उसके संतुलन को तोड़ नहीं सकती। असंतुलन का खतरा अवस्था के हर तुलसी प्रज्ञा जुलाई - दिसम्बर, 2001 Jain Education International For Private & Personal Use Only 85 www.jainelibrary.org
SR No.524608
Book TitleTulsi Prajna 2001 07
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShanta Jain, Jagatram Bhattacharya
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year2001
Total Pages170
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Tulsi Prajna, & India
File Size8 MB
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