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________________ होती है । श्री जयकृष्ण के व्याकरणशास्त्र पर इतनी अधिक ग्रंथ इनकी असाधारण विद्वत्ता के उत्कृष्ट प्रमाण हैं । विद्वान् और इनके द्वारा रचित ग्रंथों में से किसी भी इतिहास सम्बन्धी ग्रंथों में न होना सचमुच दुर्भाग्य का 'सारमञ्जरी' पर सिहावलोकन श्रीजयकृष्णकृत सारमञ्जरी आस्तिक ग्रंथ है, जिसके आदि में ग्रंथ की निर्विघ्न समाप्ति के लिये विविध मङ्गलाचरण के अंतर्गत नमस्कारात्मक मङ्गलाचरण किया गया है मात्रा में विहित ये विशिष्ट व्याकरणशास्त्र के इस उद्भट ग्रंथ का नाम व्याकरणशास्त्र के विषय है । * हेरम्बचरणद्वन्द्वं विघ्ननाशकरं परम् । प्रणम्य जयकृष्णेन क्रियते सारमञ्जरी ॥" अर्थात् विघ्नविनाशक शिवपुत्र गणेशजी के उत्तम चरण युगल को प्रणाम करके जयकृष्ण द्वारा सारमञ्जरी नामक ग्रंथ रचा जा रहा है । प्रस्तुत मङ्गलकारी पद्य के निमित्त आचार्य श्री जयकृष्ण तकलङ्कार ने अध्येताओं के समक्ष प्रतिपाद्य विषय का सूक्ष्म रूप से सङ्केत सा कर दिया है । पद्य के 'हेरम्बचरणद्वन्द्वम्' पद में वर्तमान 'चरणद्वन्द्वम्' पद से शब्द और अर्थ की ओर सङ्केत किया है कि व्याकरणशास्त्र के जो सिद्धांत व्यापक रूप में उपस्थित हैं तथा जिन सिद्धांतों को विभिन्न आचार्यों ने व्यापक रूप से वर्णित किया है उन्हीं सिद्धांतों को श्री जयकृष्ण ने सार अर्थात् अत्यल्प शब्दों द्वारा कहा है और इस प्रकार ये व्याकरणविषयक सिद्धांत 'मञ्जरी' अर्थात् गुच्छे के सदृश पाठक को एकत्र ही प्राप्त हो जाते हैं जिससे अध्येता इन सिद्धांतों को पढ़कर आत्मतोष प्राप्त कर सकता है । यद्यपि सारमंजरी एक संक्षिप्त रचना है तथापि व्याकरणदर्शन के अध्ययन की दृष्टि से इसका विशेष महत्त्व है । इस कृति में व्याकरण, न्याय, साहित्य, मीमांस और वैदिक सिद्धांतों को सार रूप में सगृहीत किया गया है जिससे इन सिद्धांतों Jain Education International * भ्रातृ - कृति - परिचय - श्री जयकृष्ण और उनके तीनों भ्राता भी न्याय और व्याकरण के प्रकाण्ड पण्डित थे, परंतु दुर्भाग्यवश महादेव और रामकृष्ण के किसी ग्रन्थ के बारे में किसी भी प्रकार की कोई जानकारी नहीं मिलती । श्रीकृष्ण भट्ट के दो ग्रन्थों के बारे में जानकारी उपलब्ध है । वे दो ग्रंथ हैं वृत्तिदीपिका और आख्यातवाद-विस्तरस्त्वस्मकृताख्यातवादे द्रष्टव्यः । ९ वृत्तिदीपिका के आरम्भ में अभिधा आदि तीनों वृत्तियों के निरूपण के अनन्तर धात्वर्थादि पर विचार किया गया है । तत्पश्चात् प्रसङ्गवश हिंसालक्षण विचार, नित्यत्व विचार, अपूर्व साधन विचार इत्यादि विषयों को उद्घाटित करके सन्नर्थ, कृदर्थ तथा समास-शक्ति का निरूपण किया गया है । अंत में उपसंहार के रूप में स्फोट विचार प्रस्तुत किया गया है । चवालीस पृष्ठीय इस ग्रंथ में साहित्यशास्त्र, व्याकरणशास्त्र और न्यायशास्त्र के मुख्य सिद्धांतों की लेखक ने सुसज्जित करके पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करने का स्तुत्य प्रयास किया है। इस प्रकार ६४ For Private & Personal Use Only तुलसी प्रशा www.jainelibrary.org
SR No.524591
Book TitleTulsi Prajna 1997 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorParmeshwar Solanki
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year1997
Total Pages216
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Tulsi Prajna, & India
File Size9 MB
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