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पृष्ठ 341 पर तो शब्द-भेद प्रकाश को महेश्वर कवि की एक अन्य रचना बतलाया है पर पृष्ठ 362 पर "दोनों रचनाएं एक ही ग्रन्थ में हैं । अत: दोनों को एक समझना चाहिए" यह लिखकर एक भ्रम उत्पन्न कर दिया है कि विश्व प्रकाश और शब्द भेद प्रकाश दो अलगअलग ग्रन्थ हैं या एक ही ग्रन्थ है । वास्तव में ये दोनों अलग-अलग्र ग्रन्थ हैं । शब्द-भेद प्रकाश कोश का नाम भी शुद्ध रूप में नहीं लिखा गया है। वास्तव में उसका नाम 'शब्द प्रभेद नाममाला' है । पृष्ठ 341 पर कर्ता का केवल महेश्वर नाम लिखा है, पृष्ठ 362 पर ऊपर नीचे दोनों जगह 'महेश्वर सूरि' नाम लिख दिया है, इससे भी एक भ्रम उत्पन्न होता है । क्योंकि 'सूरि' यह श्वेताम्बर समाज में आचार्य पद का सूचक एक विशेषण है क्योंकि वे 'सूरि मन्त्र' की आराधना करते हैं। 'सूरि मन्त्र' के कई कल्प प्रकाशित हैं । वास्तव में महेश्वर जैन नहीं थे, अत: जैनाचार्य सूचक विशेषण 'सूरि' उनके नाम के साथ अपनी ओर से लगा देना ठीक नहीं है । महेश्वर कवि के विश्व प्रकाश की प्रशस्ति 27 श्लोकों की इस समय मेरे सामने है, जो कि L.D. इन्स्टीट्यूट के हस्तलिखित ग्रन्थों में से पुण्यविजयजी के संग्रह की सूची के भाग दो में प्रकाशित है। उसमें लिखा है - "सफल वैद्यराज, चक्रयुक्ता, शेखर रहस्य गद्य-पद्य विद्यानिधेः श्री महेश्वरस्य कृतो विश्वप्रकाशाभिधानेन नानार्थपरिच्छेदो द्वितीयः समाप्तः शुभम् ।" इससे उनके नाम के साथ सूरि' पद जोड़ना भ्रमोत्पादक ही है।
___ जिस वृत्ति का उल्लेख ऊपर और नीचे किया गया है वास्तव में वह विश्वप्रकाश की वृत्ति नहीं है, वह शब्द-प्रभेद की वृत्ति है। वृत्तिकार का नाम जिनविमल नहीं, ज्ञानविमल ही है । उनके गुरु का नाम आचार्य भानुकेश नहीं, वाचक भानुमेरु था। वे आचार्य नहीं थे। यह 'शब्द प्रभेद वृत्ति' प्रकाशनार्थ भेजी हुई हैं। मैंने बीकानेर-ज्ञान-भण्डार से भी इसकी हस्तलिखित प्रति महोपाध्याय विनयसागर को भेजी और थी इन्होंने इसका सम्पादन किया है।
श्री गौरीशंकरजी ओझा लिखित 'बीकानेर राज्य इतिहास' भाग 1 के पृष्ठ 201 की टिप्पणी में इस टीका की प्रशस्ति के अन्तिम चार श्लोक छपे हैं। जिनमें से तीन श्लोक यहां दिये जा रहे हैं । ओझाजी ने लिखा है-बीकानेर में रहकर जैन-साधु ज्ञान विमल ने कातिकादि वि० स० 1654 आषाढ़ सुदि 2 चैत्रादि वि० सं० 1655 ई० सं० 1598 ता० 25 जून रविवार को महेश्वर के शब्द-भेद की टीका समाप्त की थीं
श्री मद्विक्रमनगरे राजच्छीराजसिंहनृपराज्ये । सलोक चक्रवाक प्रमोद सूर्योदये सम्यक् ॥2411 चतुराननवदनेन्द्रियैरसवसुधासंमितेलपर्षे । श्री मद्विक्रमनृपती निः क्रान्ते (1654) तीवकृत हर्षे ।।25।। शुभोपयोगे शुभयोगयुक्ते चरे द्वितीयादिवसेति शुद्ध ।
आषाढ मासस्य विशुद्धपक्षे पुण्यक्षसंयुक्तगभस्तिवारे ।।26।। अल्प संशोधन-डा० शास्त्री ने पृष्ठ 363 में महाकवि धनपाल के पाइयलच्छी नाममाला की रचना धारा नगरी के अन्तर्गत मानखेड़ गांव में हुई लिखा है। पर यह डा० शास्त्री जी के समझने की भूल है, प्रशस्ति की गाथाएं जो उन्होंने टिप्पणी के पृष्ठ 384 में उद्धत की है, उसका भाव तो यह है कि मालवनरेन्द्र की धाड़ ने मानखेड़ को लूटा था। रचना तो धारा नगरी में ही हुई है।
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तुलसी प्रज्ञा
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