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________________ "शब्द-प्रभेद टीका और उसके कता" डा० देवेन्द्र कुमार शास्त्री के निबन्ध का कतिपय प्रावश्यक संशोधन श्री अगरचन्द नाहटा तेरापंथ-सम्प्रदाय के आचार्य तुलसी के गुरु श्री कालगणि का जन्म समारोह अभी कुछ महीनों पहले छापर में मनाया गया। उसके उपलक्ष्य में एक स्मारिका और तीन महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ प्रकाशित हुए हैं। उनमें से संस्कृत, प्राकृत, जैन व्याकरण और कोश की परम्परा नामक ग्रन्थ सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं। करीब 600 पृष्ठों के इस ग्रन्थ में जैन व्याकरण और कोश सम्बन्धी कई विद्वानों के लेख हैं। उनमें कोश साहित्य के संबंध में सबसे पहला और बड़ा निबन्ध डा० देवेन्द्र कुमार शास्त्री का है। इस निबन्ध का नाम है-"संस्कृत, प्राकृत तथा अपभ्रंश की आनुपूर्वी में कोश साहित्य" । डा० शास्त्री लेखन सम्पादन आदि का काफी काम कर रहे हैं। उनसे भविष्य में बहुत-बहुत आशाएँ हैं पर बीच-बीच में सामग्री की कमी और गुरु-परम्परा आदि के अभाव के कारण कुछ महत्वपूर्ण गलतियां भी उनके निबन्ध में पायी जाती हैं, जिसका संशोधन कोई विशिष्ट अध्ययनशील विद्वान ही कर सकता है । पर हमारे विद्वानों को इतना अवकाश ही कहाँ है ? विद्वानों को आवश्यक सामग्री भी उपलब्ध नहीं होती, इसीलिये कभी-कभी कुछ महत्वपूर्ण संशोधन मुझे करने पड़ते हैं, जिससे भविष्य में उन गलतियों की पुनरावृत्ति न हो, क्योंकि साधारणतया सभी विद्वान दूसरों के (प्रकाशित) ग्रन्थों पर ही आधारित होकर लिखते रहते हैं, स्वयं मूल ग्रन्थों का अध्ययन नहीं कर पाते हैं । अतः जो भूल एक बार किसी ने कर दी, उसकी पुनरावृत्ति अनेक बार होती रहती है। यहां तक किसी के द्वारा संशोधन प्रकाशित कर देने पर भी उसमें सुधार नहीं हो पाता। डा० शास्त्री के निबन्ध के पृष्ठ 341 पर लिखा है-"महेश्वर कवि कृत विश्व प्रकाशन 1111 ई० की रचना है। इनकी एक रचना शब्द प्रभेद प्रकाश है ।" पृ० 362 पर छपा है-"संस्कृत के सुप्रसिद्ध कवि तथा कोशकार महेश्वर सूरि कृत विश्व प्रकाश की कृति सं० 1654 में खरतरगच्छ के आचार्य भानु के शिष्य जिनविमल ने रची थी जो महत्वपूर्ण मानी जाती है।" इसी पृष्ठ पर नीचे लिखा है - श्री ज्ञानविमलगणि ने ई० 1598 में शब्द-भेद प्रकाश की रचना की थी। सम्भवतः उपर्युक्त उल्लिखित जिनविमल कृत वृत्ति वाली यह रचना है, क्योंकि महेश्वर सूरि कृत विश्व प्रकाश और शब्द भेद प्रकाश दोनों रचनाएं एक ही ग्रन्थ में है अतः दोनों को एक समझना चाहिये । ज्ञानविमलगणि के नाम से कोई शब्द भेद प्रकाश अभी हमारे देखने में नहीं आया है।" खण्ड ४, अंक २ १५३ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.524515
Book TitleTulsi Prajna 1978 07
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShreechand Rampuriya, Nathmal Tatia, Dayanand Bhargav
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year1978
Total Pages142
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Tulsi Prajna, & India
File Size3 MB
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