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________________ चैतन्य शक्ति का आदान-प्रदान : एक वैज्ञानिक परीक्षण अनु०-श्री शुभकरण सुराणा और कु० इलाबहन जवेरी चैतन्य शक्ति (Life force) या कोस्मिक ऊर्जा जिससे सभी सजीव वस्तुए परिव्याप्त हैं, का उपयोग पौधे, प्राणी और मनुष्य सभी मिलजुलकर करते हैं। उस सहोपयोग के द्वारा व्यक्ति और पौधा एक होता है। यह एकत्व पारस्परिक सजगता उभारता है, जिसके द्वारा मनुष्य और पौधे के बीच सम्पर्क ही नहीं बल्कि उस सम्पर्क का रेकार्ड पौधे के माध्यम से रेकार्डिंग चार्ट पर अंकित किया जा सकता है । क्योंकि उसके (वोगेल) के निरीक्षणों से स्पष्ट पता चल गया कि परस्पर ऊर्जा का आदान-प्रदान ही नहीं बल्कि मानवीय और पौधे की ऊर्जाओं का एकीकरण (Fusion) भी संभव है । वोगेल ने आश्चर्य किया कि क्या विशेष रूप से सजग व्यक्ति पौधे के अन्दर भी प्रवेश कर सकता है ? क्योंकि उसे (वोगेल) यह खबर प्राप्त थी कि 16वीं शताब्दी के जर्मन रहस्यवादी जैकब बोहेम जब तरुण था तो विशेष ज्ञान का प्रकाश हुआ, जिससे उसने बताया कि वह सामान्य भूमिका से अलग विशेष पार्श्व भूमिका में देखने को था । बोहेम ने बताया कि वह बढ़ते हुए पौधों को देखते-देखते एकाएक अगर वह चाहे तो उसी पौधे के साथ घुलमिल सकता था, पौधे का एक अंग बन सकता था, उसके जीवत्व का अहसास भी कर सकता था, जो कि (पौधा) प्रकाश की तरफ बढ़ने के लिए प्रयासरत था। उसने कहा कि वह पौधे की सामान्य अभिलाषाओं का सहभागी बन सकता है और आनन्द से फूटती हुई पत्तियों के साथ-साथ स्वयं भी आनन्दित हो सकता है। एक दिन डेब्बी सेप नाम की एक शान्त व सामान्य-सी प्रतीत होने वाली लड़की ने वोगेल से सेन्टजोसे में मुलाकात की। वोगेल अपने यन्त्रों से सज्जित फिलोडोल्ड्रन (Philodendron) पौधे के साथ उसकी तत्काल सम्पर्क करने की प्रारंभिक योग्यता से प्रभावित हुआ । जब पौधा एकदम शान्त था उसने उससे स्पष्ट पूछा- क्या तुम इस पौधे में प्रवेश कर सकती हो ? डेब्बी के स्वीकारात्मक सिर हिलाकर सम्मति देने पर उसके चेहरे पर एक निष्काम शान्ति, वैराग्य का भाव उठा जैसे कि वह दूर किसी अन्य जगत में विचरण करने चली हो । तत्काल रेकार्ड करने वाली सुई ने तरंगों का एक व्यवस्थित चित्र अंकित किया जिससे वोगेल ने यह समझा कि पौधा उससे (उस लड़की से) असामान्य मात्रा में ऊर्जा प्राप्त कर रहा था। डेब्बी ने बाद में लिखित विवरण दिया कि वोगेल ने मुझे शिथिल होने और फिलोडोल्ड्रन (Philodendron) में अपने स्व (आत्म प्रदेशों) को फैलाने को कहा । उसके निवेदन को कार्यान्वित करते समय कुछ एक घटनाएं हुई। १५० तुलसी प्रज्ञा Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.524515
Book TitleTulsi Prajna 1978 07
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShreechand Rampuriya, Nathmal Tatia, Dayanand Bhargav
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year1978
Total Pages142
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Tulsi Prajna, & India
File Size3 MB
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