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________________ हिंसा होती है, ऐसा जिन सिद्धान्त का संक्षिप्त रहस्य है । निश्चय कर योग आचरण वाले सन्त पुरुष के रागादि भावों के अनुप्रवेश बिना केवल प्राणपीडन से हिंसा कदाचित् भी नहीं होती । रागादि भावों के वश में प्रवृत्ति रूप अयत्नाचार रूप प्रमाद अवस्था में जीव मरे अथवा न मरे हिंसा तो निश्चय कर आगे ही दौड़ती है । क्योंकि जीव कषाय भावों सहित होने से पहले आपके ही द्वारा आप की घात करता है फिर पीछे से चाहे अन्य जीवों की हिंसा हो अथवा नहीं। हिंसा में विरक्त न होना, हिंसा और हिंसा रूप परिणमना भी हिंसा होती है । इसलिए प्रमाद के योग में निरन्तर प्राण घात का सद्भाव है । निश्चय कर कोई जीव हिंसा को नहीं करके भी हिंसाफल के भोगने का पात्र होता है और दूसरा हिंसा करके भी हिंसा के फल को भोगने का पात्र नहीं होता है 130 ( 3 ) द्रव्यतः हिंसा भावतः हिंसा : इस भंग को समझने के लिए आचार्यों के निम्न मन्तव्य सहायक होंगे । (1) भद्रबाहु लिखते हैं यदि कोई पुरुष प्रमत्त है और उसके योग से सत्त्वों का व्यापादन होता है तो नियम से वह उनका हिंसक है । 31 यहां प्रमाद होने से भावतः हिंसा है । साथ-साथ प्राणघात भी है अतः द्रव्यतः हिंसा है । (2) संघदास गणि ने लिखा है : "असंयती या संयंती जो समितियुक्त नहीं होते उन 30. पुरुषार्थ सिद्धयुपाय 43-48, 51 यत्खलुकषाययोगात्प्राणानां द्रव्यभावरूपाणाम् । व्यपरोपणस्य करणं सुनिश्चिता भवति सा हिंसा || अप्रादुर्भावः खलु रागादीनां भवत्य हिंसेति । तेषामेवोत्पत्तिर्हि सेति जिनागमस्य संक्षेपः ॥ युक्ताचरणस्य सतो रागाद्यावेशमन्तरेणापि । न हि भवति जातु हिंसा प्राण व्यपरोपणादेव || व्युत्थानावस्थायां रागादीनां वश प्रवृत्तायाम् । म्रियतां जीवो मा वा धावत्यग्रे ध्रुवं हिंसा ॥ यस्मात्कषायः सन् हन्त्यात्मा प्रथममात्मनात्मानम् । पश्चाज्जायेत न वा हिंसा प्राण्यन्तराणां तु ॥ हिंसायामविरमणं हिंसापरिणमनमपि भवति हिंसा । तस्मात्प्रमत्तयोगे प्राणव्यपरोपणं नित्यम् ॥ अविधायापि हि हिंसा हिंसा फल भुग् भवत्येकः । कृत्वाप्यपरो हिंसा हिसाफलभाजनं न स्यात् ॥ १३४ 31. atafag ft 752 जो य पत्तो तस्स य जोगं पडुच्च जे सत्ता | वावज्जते नियमा तेसिं सो हिंसओ होइ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only तुलसी प्रज्ञा www.jainelibrary.org
SR No.524515
Book TitleTulsi Prajna 1978 07
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShreechand Rampuriya, Nathmal Tatia, Dayanand Bhargav
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year1978
Total Pages142
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Tulsi Prajna, & India
File Size3 MB
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