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________________ UPHIN/2006/16750 प्रवचन के पॉइन्ट मुनि श्री क्षमासागर जी : संस्मरण प्रसंग * सरोजकुमार इंदौर जैनसमाज के सर्वमान्य नेता पद्मश्री बाबूलाल पाटोदी की यह इच्छा सदैव रही है, कि अच्छे उद्बोधन देनेवाले विद्वान् जैनमुनियों का, नगर के सर्वसाधारण नागरिकों की सभाओं में, प्रवचन हो। श्री पाटोदी ने मुनिश्री विद्यानंदजी के अनेक प्रवचन नगर के विभिन्न स्थानों पर आयोजित किए थे, जिन्हें सुनने विशाल जन-समुदाय एकत्रित होता था। वर्ष 1996में इंदौर में संपन्न मुनि श्री क्षमासागर जी के चातुर्मास के समय जब पाटोदी जी ने देखा, कि मुनिश्री के प्रवचन अत्यंत प्रभावशाली होते हैं और उनकी अभिव्यक्ति का फलक अत्यंत विस्तृत होता है, तब उनके मन में विचार आया कि मुनिश्री के प्रवचन नगर के विभिन्न समुदायों के नागरिकों के बीच भी होना चाहिए। चातुर्मास प्रारंभ होने के कुछ ही समय बाद से यह सभी को ज्ञात होता जा रहा था, कि मुनिश्री न केवल प्रखर वाग्मी हैं, अपितु उद्भट विद्वान् भी हैं। पाटोदी जी ने मुनिश्री से जवाहर मार्ग स्थित वैष्णव महाविद्यालय के प्रांगण में प्रवचन हेतु स्वीकृति प्राप्त की। प्रवचन की पूर्व संध्या श्री पाटोदी मुनिश्री की वंदना हेतु उपस्थित हुए। दूसरे दिन सुबह होनेवाले मुनिश्री के प्रवचन को लेकर संभवतः श्री पाटोदी के मन में कुछ बातें होंगी। अतः बातों ही बातों में वे मुनिश्री को सुझाने लगे कि महाराज, आप प्रवचन के पूर्व अपना अत्यंत प्रभावशाली ओंकार का उच्चारण अवश्य निनादित कीजियेगा। लम्बी साँस में आपके मुख से ओंकार ध्वनि चारों दिशाओं को बाँध लेती है। मुनिश्री ने शांतभाव से यह बात सुनी, और यथावत् मौन बैठे रहे। श्री पाटोदी ने पुनः कहा, महाराज, आप अपने प्रवचन में अंगुलिमाल की कथा अवश्य सुनाइयेगा। कंचनबाग के प्रांगण में इस कथा को सुनकर सभी उपस्थितों की आँखें भींग गई थीं। मुनिश्री इस सुझाव के बाद भी कुछ नहीं बोले। श्री पाटोदी ने मुनिश्री के प्रवचनों के विषयों को लेकर कुछ और सुझाव भी दिए। मुनिश्री गंभीर मुद्रा में आदर्श श्रोता की तरह सारे सुझाव सुनते रहे। फिर श्री पाटोदी के सुझावों के बाद, अपनी चुप्पी तोड़ते हुए अत्यंत सरल भाव से बोले, 'पाटोदी जी! और भी बता दीजिए, मुझे सभा में और क्या-क्या बोलना है....?' श्री पाटोदी मुनिश्री के कथन में व्याप्त चुटकी सुनकर पानी-पानी हो गए, और यही कह पाए, 'महाराज, आपकी जय हो।' -का मनोरम, 37 पत्रकार कॉलोनी, इन्दौर, म.प्र. स्वामी, प्रकाशक एवं मुद्रक : रतनलाल बैनाड़ा द्वारा एकलव्य ऑफसेट सहकारी मुद्रणालय संस्था मर्यादित, 210, जोन-1, एम.पी. नगर, ___ Jain Education internatiभोपाल (म.प्र.) से मुद्रित एवं 1/205 प्रोफेसर कॉलोनी, आगरा-282002 (उ.प्र.) से प्रकाशित / संपादक : रतनचन्द्र जैन। For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org,
SR No.524335
Book TitleJinabhashita 2009 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRatanchand Jain
PublisherSarvoday Jain Vidyapith Agra
Publication Year2009
Total Pages36
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jinabhashita, & India
File Size5 MB
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