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________________ प्रश्नकर्ता- राजीव जैन अमरपाटन। सद्रत्नत्रयधारिणो यतिवरास्तेषां समालम्बनं, जिज्ञासा- विग्रहगति में पिछले भव की आयु तथा तत्पूजा जिनवाचिपूजनमतः साक्षाजिनः पूजितः॥१८॥ गति रहती है या अगले भव की? अर्थ- वर्तमान में इस कलिकाल में तीन लोक समाधान- मान लो कि किसी एक जीव ने जो | के पूज्य केवली भगवान् इस भरतक्षेत्र में साक्षात् नहीं मनुष्य था, मनुष्यपर्याय छोड़कर, अगली देवपर्याय पाने | हैं, तथापि समस्त भरतक्षेत्र में जगत्प्रकाशिनी केवली के लिये गमन किया तब, जब तक मनुष्य आयु तथा | भगवान् की वाणी मौजूद है तथा उस वाणी के आधारमनुष्य गति का उदय है, तब तक वह जीव, मनुष्य | स्तम्भ श्रेष्ठ रत्नत्रयधारी मुनि भी हैं। इसलिए इन मुनियों पर्याय को नहीं छोड़ता है। मनुष्य आयु के अन्तिम निषेक का पूजन तो सरस्वती का पूजन है तथा सरस्वती का उदय के उपरान्त ही वह जीव मनुष्य पर्याय छोड़कर | पूजन साक्षात् केवली भगवान् का पूजन है। विग्रहगति में प्रवेश करता है और विग्रहगति के प्रथम सागारधर्मामृत में पं० आशाधर जी ने इसप्रकार समय से ही देवगति एवं देवायु का उदय प्रारम्भ हो | कहा हैंजाता है। कर्मकाण्ड गाथा २८५ में इसप्रकार कहा गया | ये यजन्ते श्रुतं भक्त्या ते यजन्तेऽञ्जसा जिनम्। _ न किञ्चिदन्तरं प्राहुराप्ता हि श्रुतदेवयोः॥ ४४॥ गदि आणुआउउदओ सपदे भूपुण्णबादरे ताओ। भावार्थ- जो मानव भक्तिपूर्वक जिनवाणी की पूजा उच्चुदओ णरदेवे थीणतिगुदओ रे तिरिये॥ | करते हैं, वे निश्चय से जिनेन्द्र भगवान् की पूजा करते ___ अर्थ- किसी भी विवक्षित भव के प्रथम समय हैं। क्योंकि गणधरदेव ने जिनवाणी और जिनेन्द्रदेव में में ही, उस विवक्षित भव के योग्य गति-आनुपूर्वी और कुछ भी अन्तर नहीं कहा है। अर्थात् जो श्रुत है वह आयु का उदय होता है। तथा 'सपदे' कहने से एक देव है, जो देव है वह श्रुत है। जीव के एक ही गति आनपूर्वी तथा आयु का उदय श्री श्रुतसागर सूरि द्वारा लिखित निम्न श्लोक में, युगपत होता है। बोधपाहुड़ गाथा १६ की टीका में इसप्रकार कहा गया इस प्रकार विग्रहगति के प्रथम समय से ही, प्राप्त होनेवाली अगली पर्याय सम्बन्धी गति व आयु का उदय ज्ञानकाण्डे क्रियाकाण्डे चातुर्वर्ण्यपुरःसरः। मानना चाहिए। सूरिदेव इवाराध्यः संसाराब्धितरण्डकः॥ जिज्ञासा- सच्चे देव-शास्त्र और गुरु में, किसको अर्थ- जो ज्ञानकाण्ड और क्रियाकाण्ड में शिक्षा बड़ा मानना चाहिए या तीनों को समान मानना चाहिए? और दीक्षा में ऋषि, यति, मुनि और अनगार इन चार समाधान- उपर्युक्त प्रश्न का समाधान, विभिन्न | प्रकार के मुनियों के अग्रसर हैं तथा संसाररूपी समुद्र दृष्टियों से विभिन्न प्रकार का हो सकता है। जैसे कोई | से पार करने के लिये नौका के समान हैं, ऐसे आचार्य कहता है कि सबसे बड़े तो अरिहन्त देव ही हैं, क्योंकि परमेष्ठी देव के समान आराधना करने के योग्य हैं। यदि उनकी वाणी न खिरती, तो जिनवाणी का उद्गम | उपर्युक्त प्रमाणानुसार कथंचित् देव, शास्त्र और गुरु कैसे होता और यदि जिनवाणी का उद्गम न होता, तो | को समान भी कहा जा सकता है। मुनिराज, मुनि के योग्य आचरण का अध्ययन और पालन जिज्ञासा- नरकगति के उदय से नारक पर्याय कैसे करते। इसीलिए तो सभी जैनबन्धु सर्वप्रथम 'देव | मिलती है या नरकायु के उदय से मिलती है? शास्त्र-गुरु' पूजा नित्य प्रातःकाल करते हैं। इसमें भी । समाधान- श्री धवला पु. १०, पृष्ठ २३९ में इस इसी अपेक्षा से क्रम रखा गया है।। प्रकार कहा हैं- 'जिस्से गईए आउअं बद्धं तत्थेव अन्य दृष्टि के अनुसार तीनों को समान भी कहा | णिच्छएण उपज्जति त्ति।' गया है। जैसा कि पद्मनन्दिपञ्चविंशतिका १/६८ में इस अर्थ- जिस गति की आयु बाँधी गई है, निश्चय प्रकार कहा है से वहाँ ही उत्पन्न होता है। संप्रत्यस्ति न केवली किल कलौ त्रैलोक्यचूडामणि, यदि यहाँ कोई यह शंका करे कि नरकगति के स्तद्वाचः परमासतेऽत्र भरतक्षेत्रे जगद्द्योतिकाः।। उदय एवं सत्व के कारण नरक पर्याय मिलती है, तो 22 नवम्बर 2008 जिनभाषित Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.524333
Book TitleJinabhashita 2008 11
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRatanchand Jain
PublisherSarvoday Jain Vidyapith Agra
Publication Year2008
Total Pages36
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jinabhashita, & India
File Size4 MB
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