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________________ है। जिज्ञासा-समाधान पं. रतनलाल बैनाड़ा प्रश्नकर्ता- पं० राकेश जैन लोहारिया। समाधान- उपरोक्त प्रश्न का समाधान आदरणीय प्रश्न- जैनध्वज में पाँच रंग किसके प्रतीक हैं? | पं० जवाहरलालजी शास्त्री भीण्डरवालों ने करणदशक समाधान- वीरनिर्वाण के 2500वें वर्ष के अवसर नामक पुस्तक में अच्छी प्रकार लिखा है, उसी के आधार पर आ० विद्यानन्द जी ने सर्वप्रथम जैनध्वज का प्रचलन | से यहाँ लिखते हैं। आरंभ किया। जैनध्वज में पाँच वर्ण होते हैं। सबसे पहला तीर्थंकर नामकर्म का उदय 13वें गुणस्थान से प्रारंभ लाल रंग सिद्ध परमेष्ठी एवं पुरुषार्थ-कल्याण का प्रतीक | होकर 14वें गुणस्थान के अंत तक रहता है। 12वें गुणस्थान है। दसरा पीत वर्ण आचार्य परमेष्ठी व धनादि का प्रतीक | तक के जीवों को तीर्थंकर नहीं कहा जा सकता क्योंकि है। तीसरा सफेद रंग अरिहंत परमेष्ठी तथा शांति को उनके तीर्थंकर नामकर्म के उदय का अभाव है। एक प्रदर्शित करने वाला है। चौथा हरा रंग उपाध्याय परमेष्ठी कल्पकाल में 20 कोड़ाकोड़ी सागर होते हैं। इतने काल का प्रतीक है एवं भय का नाश करने वाला है। अंतिम | में भरत. ऐरावत में तो उत्सर्पिणी का तीसरा व अवसर्पिणी पाँचवा नील वर्ण साधु परमेष्ठी तथा विजय का प्रतीक | का चौथा ये दो काल ऐसे आते हैं कि जिनमें मोक्षमार्ग खुला रहता है तथा तीर्थंकर नामकर्म के उदय वाले जीव मानसार ग्रंथ के अध्याय 35 (स्थापत्य एवं | भी मिलते हैं। पाँच भरत एवं पाँच ऐरावत = 10 क्षेत्रों मूर्तिकला) में इस प्रकार कहा है में इस एक कल्पकाल में 24x10-240 तीर्थंकर अवसर्पिणी स्फटिंक श्वेतं रक्तं च, पीतश्यामनिभं तथा। में तथा 240 ही तीर्थंकर उत्सर्पिणी में होते हैं अर्थात् एतत्पंचपरमेष्ठिनः पंचवर्णं यथाक्रमम्॥ एक कल्पकाल में सभी भरत एवं ऐरावत क्षेत्रों में 480 प्रश्नकर्ता- राजेश कुमार जबलपुर। तीर्थंकर होते हैं न कम और न अधिक। परंतु विदेह प्रश्न- क्या अभव्य नौंवे ग्रैवेयक तक जा सकता क्षेत्र में, श्लोकवार्तिक द्वितीयखण्ड पृष्ठ-96 के अनुसार, एक कल्पकाल में असंख्यात तीर्थंकर नियम से हो जाते समाधान- शास्त्रों में अभव्य का गमन नवें ग्रैवेयक हैं। इसका कारण यह है कि प्रथम तीन नरकों में तीर्थंकर तक कहा है जिसके प्रमाण इस प्रकार हैं प्रकृति की सत्तावाले असंख्यात जीव तथा स्वर्गों में भी 1. तिलोयपण्णत्ति अधिकार-8 में इस प्रकार है- | | असंख्यात जीव नियम से होते हैं। नरकों में तीर्थंकर जिणलिंग-धारिणोजे, उक्किट्ठ-तवस्समेण संपुण्णा।। प्रकृति की सत्तावाले नारकियों की उत्कृष्ट आयु कुछ ते जायंति अभव्वा, उवरिम-गेवेज्ज परियंतं ।। 583॥ अधिक 3 सागर होती है (देखें-महाधवल 1/56-57)। अर्थ- जो अभव्यजीव जिनलिंग को धारण करते अतः वर्तमान में जो तीर्थंकर प्रकृति की सत्ता वाले हैं और उत्कृष्ट तप के श्रम से परिपूर्ण हैं वे उपरिम असंख्यात नारकी हैं वे सब साधिक तीनसागर काल ग्रैवेयक पर्यन्त उत्पन्न होते हैं। | में नियम से मनुष्यगति प्राप्तकर तीर्थंकर बन जायेंगे और 2. मूलाचार-भाग 2 पृष्ठ 303 पर इस प्रकार कहा| ये सभी तीर्थंकर विदेहक्षेत्र में ही होंगे। क्योंकि पाँच भरत और पाँच ऐरावत क्षेत्र में तो 20 कोड़ाकोड़ी सागर काल जा उवरिमगेवज्जं उववादो अभवियाण उक्कस्सो।। में मात्र 480 तीर्थंकर ही होते हैं इससे अधिक नहीं। उक्केद्वेण तवेण दुणियमा णिग्गंथलिंगेण ॥ 1178॥ देवगति में तीर्थंकर प्रकृति की सत्तावाले देवों की अर्थ- अभव्यों का उत्कृष्ट जन्म निश्चित ही उत्कृष्ट आयु 33 सागर होती है और इनकी संख्या निग्रंथ लिङ्ग द्वारा उत्कृष्ट तप से उपरिम ग्रैवेयक पर्यन्त | असंख्यात कही गयी है। धवल पुस्तक 8-पृष्ठ 75 के होता है। अर्थात् निग्रंथ मुद्रा एवं उत्कृष्ट तप के धारी अनुसार जिस गति में तीर्थंकर प्रकृति का आरंभ हुआ अभव्यजीव नौंवे ग्रैवेयक तक जाते हैं। हो, उसे लेते हुए भी तीसरे भव में वह जीव नियम प्रश्नकर्ता- कु० रेणु इंदौर। से तीर्थंकर बनकर मुक्तिलाभ पाता है। अतः ये सभी प्रश्न- एक कल्पकाल में कितने तीर्थङ्कर हो सकते | तीर्थंकर प्रकृति की सत्ता वाले असंख्यात देव भी. साधिक -जनवरी 2008 जिनभाषित 27 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.524324
Book TitleJinabhashita 2008 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRatanchand Jain
PublisherSarvoday Jain Vidyapith Agra
Publication Year2008
Total Pages36
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jinabhashita, & India
File Size4 MB
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