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________________ पाया जाता है कि श्रावकजन परस्पर में तो 'इच्छाकार' करें | कि जिनवर-धर्मको ग्रहण करो, अष्ट कर्मोका नाश करो और दूसरे (अजैनादि) सज्जनोंके प्रति उन्हें 'जुहारु' नामका | तथा आस्त्रव के द्वार को रोको । और 'जु' से युगकी आदि नमस्कार करना चाहिए। परन्तु मूलमें 'सज्जनाः' पद प्रथमान्त ऋषभदेव, 'हा' से जो सर्व कष्टोंको हरने वाले हैं, 'र' से पड़ा है और 'श्राद्धाः' पदके समकक्ष है। इससे श्रावकगण | जो सबकी रक्षा करते हैं। जुहारुका प्राचीन रिवाज मालूम सज्जनवर्ग को जुहारु करें, यह अर्थ नहीं बनता बल्कि | होता है।' सज्जनजन परस्पर में जुहारु करें, ऐसा अर्थ निकलता है। इस नोटमें अन्तका एक वाक्य तो ब्रह्मचारीजीकी परन्त श्रावकजनों से भिन्न दूसरे वे सज्जन-जन कौन-से हैं | सम्मति का है. बाकी सब गाथा तथा श्लोकका क्रमश: अर्थ जिनके लिये परस्परमें जुहारु का यह पृथक विधान किया है, परन्तु ब्रह्मचारीजीने गाथाका जो अर्थ किया है वह ठीक गया है, यह बात कुछ समझ में नहीं आती और न इससे नहीं है। गाथामें ऐसा कोई क्रिया-पद नहीं. जिसका अर्थ श्रावकों में परस्पर या दूसरों के प्रति जुहारु की बात ही | 'ग्रहण करो', 'नाश करो' अथवा 'रोको' होवे । जान पड़ता कायम रहती है। अत: इस पद्य की हालत संदिग्ध है और | है गाथा में धम्मो' को 'धम्म' लिख देनेसे ही आपको क्रियावह प्रकृत विषय का समर्थन करने के लिये समर्थ नहीं हो | पदों का अर्थ समझनेमें गलती हई है। और इससे आपने सकता। 'धम्मो' के अशुद्ध विशेषण पद 'गहियं' को भी क्रियापद रहे शेष दो पद्य, उनकी हालत और भी ज्यादा खराब | समझ लिया है। अस्तु, इस गाथाका आशय यह होता है कि है। वे किसी ग्रन्थ-विशेष के पद्य भी मालम नहीं होते, | 'ग्रहण किया हआ जिनवर-धर्म आठ दृष्ट-कर्मों को हनता बल्कि 'जहारु' की सार्थकता सिद्ध करने के लिये किसी है और आस्रव के द्वार को रुद्ध (बन्द) करता है ।(इस तरह अनाड़ी के द्वारा खंडरूप में गढ़े गये जान पड़ते हैं। इसी से | यह) 'जुहारु' जिनवरका कहा हुआ है। गाथाके इस उनके शब्द-अर्थ का सम्बन्ध कुछ ठीक नहीं बैठता-कहाँ | आशयपरसे 'जुहारु' शब्दकी कोई निष्पत्ति नहीं होती। यदि 'जुगादि', कहाँ ऋषभं देवं हारिणं' ये द्वितीया के एकवचनान्त | 'जिनवरधम्मो' का 'जि', 'हणेइ' का 'ह' और 'रुंधई' का पद, कहाँ 'रक्षन्ति' बहुवचनान्त क्रिया और कहाँ 'जुहारः | 'रु' ऐसे तीनों पदोंके आद्य अक्षरों का संग्रह किया जावे तो उच्यते' पदों की 'जुहाररुच्यते' यह विचित्र सृष्टि (संधि)! | उससे जिहरू' होता है- 'जुहारु' नहीं और इससे यह बिलकुल व्याकरण की रीति से इन सबकी परस्पर कोई संगति नहीं | स्पष्ट हो जाता है कि यह गाथा साधारण-बुद्धि के किसी बैठती। इसी तरह गाथा के 'जुहारो जिणवरो भणीयम्' और | अनाड़ीकी बनाई हुई है, जिसने वैसे ही उसके द्वारा जुहारुके 'धम्म गहियं' पद भी दूषित जान पड़ते हैं। और इसलिये | विषयमें अपना मन-समझौता कर लिया है। इसी तरहका 'जुहारु' शब्दकी जिस निरुक्ति-कल्पना के लिये इन पद्यों | मन-समझौता अगले 'जुगादि ऋषभं' नामके पद्यमें भी की रचना हुई है उसकी भी इनसे यथेष्ट रूपमें कोई सिद्धि | किया गया है, जो व्याकरणकी त्रुटियों से बहुत कुछ परिपूर्ण नहीं होती। बाकी जुहारु के परस्पर व्यवहारका इनमें कोई | है और जिसमें 'जुहारु' की जगह 'जुहार' शब्दका ही विधान नहीं, यह स्पष्ट ही है। यदि ये दोनों पद्य किसी | प्रतिपादन किया गया है। इन्हीं अस्त-व्यस्त, संदिग्ध और ग्रन्थ-विशेषके होते और उसमें जुहारुका विधान किया गया | ग्रन्थादिके प्रमाण रहित पद्योंके आधारपर ब्रह्मचारीजी ने 'जुहारु होता, तो भट्टारकजी उन पद्योंको भी जरूर साथमें उद्धृत | को प्राचीन रिवाज' समझा है और उक्त प्रश्न के उत्तर में यह करते। इससे भी ये पद्य किसी ग्रन्थ-विशेषके अंश मालूम | कहनेके लिये भी वे समर्थ हो सके हैं कि 'परस्पर जुहारु नहीं होते। भट्टारकजी ने इन दोनों पद्योंका कोई अर्थ भी | | करनेका ही कथन ठीक है', यह सब देखकर बड़ा आश्चर्य नहीं दिया। नहीं मालूम, इसका क्या कारण है और इस तरह | होता है? समझमें नहीं आता इन पद्योंके किस अंशपरसे क्या बात सिद्ध करने के लिये इन्हें उद्धृत किया गया है? | आपने जुहारुके रिवाजका और 'जय जिनेन्द्र' की अपेक्षा हाँ, ब्रह्मचारी शीतलप्रसादजी ने, अपने सम्पादकीय नोटमें, | | उसकी प्राचीनताका अनुभव किया है। क्या भगवान् महावीर इनका अर्थ जरूर दिया है और यों भट्टारकजी के लेख की अथवा किसी दूसरे तीर्थकरने 'जुहारु' का उपदेश दिया है. कमी को पूरा करने का प्रयत्न किया है। आपका यह नोट | और उसकी उक्त प्रकारसे दो भिन्न व्याख्याएँ की हैं, ऐसा " इस प्रकार है किसी मान्य आचार्य-द्वारा निर्मित प्राचीन ग्रन्थमें कोई उल्लेख 'जहारु का अर्थ ऊपरकी गाथा तथा श्लोकमें यह है | मिलता है? क्या इतिहाससे यह बात प्रमाणित की जा सकती 10 नवम्बर 2005 जिनभाषित Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.524302
Book TitleJinabhashita 2005 11
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRatanchand Jain
PublisherSarvoday Jain Vidyapith Agra
Publication Year2005
Total Pages36
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jinabhashita, & India
File Size4 MB
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