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ग्रंथ - समीक्षा
दिशाबोध देता है शोध - संदर्भ
शान्तिलाल जैन ( जांगड़ा )
प्राचीन जैनसाहित्य । पुराण, जैन नीति, आचार, धर्म योग एवं जैन इतिहास, संस्कृति, प्राकृत भाषा में लिखा कला एवं पुरातत्व - संबंधी शोध-प्रबन्धों का विषयवार गया। इसके उपरान्त वर्गीकृत परिचय है। जैन बौद्ध तुलनात्मक विषय के अन्तर्ग संस्कृत, अपभ्रंश, दक्षिण- जैन योग और बौद्ध योग, जैन एवं बौद्ध न्याय में अनुमान भारतीय भाषाओं, अन्य इत्यादि के तुलनात्मक अध्ययन से संबंधित शोध-प्रबन्धों प्रादेशिक भाषाओं एवं के परिचय हैं। इसी तरह जैन वैदिक तुलनात्मक अध्ययन हिन्दी में जैनसाहित्य की विषय के अन्तर्गत जैनधर्म एवं गीता में कर्मसिद्धांत, शंकर रचना हुई । मध्यकाल तक तथा कुन्दकुन्द के दार्शनिक विचार, स्वामी पारसनाथ और विभिन्न भाषाओं में लिखे गुरुनानक, जैनदर्शन और कबीर इत्यादि के तुलनात्मक गये जैनसाहित्य को धार्मिक अध्ययन से संबंधित शोध-प्रबन्धों के परिचय हैं। साहित्य मानकर इसकी अपेक्षा की गई। किन्तु उन्नीसवीं और बीसवीं सदी में प्राच्य और पाश्चात्य विद्वानों ने इस साहित्य की ओर ध्यान दिया और अनेक गवेषणात्मक और तुलनात्मक ग्रंथ लिखे गये । शोध-उपाधियों के लिए भी विभिन्न विश्वविद्यालयों के अंतर्गत अनेक शोध-प्रबन्ध लिखे गये। यह कार्य सतत् होता रहा है। प्राकृत और जैनविद्या में रुचि रखनेवाले विद्वानों एवं इस क्षेत्र में नयी शोध करनेवाले व्यक्तियों को संबंधित क्षेत्र में शोध-प्रबन्धों के परिचय की आवश्यकता सदैव रहती है। उन्हें यह ज्ञात होना चाहिए कि कौनसी सामग्री कहाँ पर उपलब्ध होगी। श्री कुन्दुकुन्दु जैन महाविद्यालय, खतौली के रीडर एवं संस्कृत विभाग के अध्यक्ष डॉ. कपूरचंद जैन ने 'प्राकृत एवं जैन विद्या: शोध-संदर्भ Bibliography of Prakrit and Jaina Research' नामक पुस्तक का सन् 2004 ई. में पूर्णतः परिवर्तित एवं परिवर्धित संस्करण प्रकाशित कर इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य किया है। पुस्तक का प्रथम संस्करण सन् 1988 ई. में एवं द्वितीय संस्करण सन् 1991 में निकाला गया था।
प्राकृत एवं जैनविद्या :
शोध- सन्दर्भ
BIBLIOGRAPHY OF PRAKRIT AND JAINA RESEARCH
Dr. Kapoor Chand Jain
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तृतीय संस्करण में भारतीय विश्वविद्यालयों में हुए लगभग 100 तथा विदेशी विश्वविद्यालयों में हुए 131 शोधप्रबन्धों का परिचय दिया गया है। भारतीय विश्वविद्यालयों
हुए लगभग 1100 शोध-प्रबन्धों को 34 विषयों में वर्गीकृत किया गया है। सर्वप्रथम प्राकृत, अपभ्रंश, संस्कृत, गुजराती, मराठी, राजस्थानी, हिन्दी एवं दक्षिण- भारतीय भाषाओं में लिखे गये जैनसाहित्य से संबंधित शोध-प्रबन्धों का भाषावार वर्गीकरण करके परिचय दिया है। इसके पश्चात् भाषाविज्ञान एवं व्याकरण, जैनागम, जैन न्याय तथा दर्शन, जैन 28 जून 2005 जिनभाषित
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जैन रामकथा - साहित्य के अन्तर्गत जैन रामकथा साहित्य का बाल्मीकिकृत रामायण, गोस्वामी तुलसीकृत रामचरित मानस इत्यादि से तुलनात्मक अध्ययन से संबंधित शोध-प्रबन्धों का परिचय दिया गया है। व्यक्तित्व एवं कृतित्व विषय के अन्तर्गत प्राचीन एवं वर्तमान युग के विभिन्न जैनाचार्यों, जैन सन्तों, पंडितों एवं विद्वानों के व्यक्तित्व एवं कृतित्व-सम्बन्धी शोध-प्रबन्धों का परिचय है। जैन विज्ञान एवं गणित विषय के अन्तर्गत दिये गये शोध-प्रबन्धों के कुछ शीर्षक हैं - गणित और ज्योतिष के विकास में जैनाचार्यों का योगदान, भारतीय दर्शन में परमाणुवाद (जैनदर्शन के विशेष सन्दर्भ में) प्राचीन भारतीय सैन्य-विज्ञान एवं युद्धनीति (जैन स्रोत के आधार पर)। जैन राजनीति विषय के अन्तर्गत जैन - साहित्य में निर्दिष्ट राजनैतिक सिद्धांत एवं जैन शिक्षा शास्त्र विषय के अन्तर्गत प्राचीन भारतीय जैन शिक्षाव्यवस्था इत्यादि से संबंधित शोध-प्रबन्धों का परिचय है। जैन मनोविज्ञान एवं भूगोल, जैन अर्थशास्त्र इत्यादि विषयों के अन्तर्गत भी कई शोध-प्रबन्धों का परिचय है, जिनका ज्ञान विद्वानों एवं शोधार्थियों के लिये उपयोगी है। इन विषयों के अतिरिक्त पर्यावरण, शाकाहार विज्ञान, गांधीवाद, मानवमूल्य, आयुर्वेद, संगीत, पुस्तकालय विज्ञान, पत्रकारिता इत्यादि विषय भी शोध-प्रबन्धों की सूची से अछूते नहीं हैं।
जैन केन्द्र, रीवा के निदेशक डॉ. नन्दलाल जैन ने इस पुस्तक का 'विदेशों में जैनविद्या शोध (Jainalogical Researches Abroad)' अध्याय लिखकर इस ग्रंथ की उपयोगिता में वृद्धि की है। अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, जापान, कनाडा, फ्रांस इत्यादि देशों में स्थिति विभिन्न विश्वविद्यालयों से संबंधित 131 शोध-प्रबन्धों का परिचय इस अध्याय से
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